अभी भी 600 कैदियों को है मसीहा का इंतज़ार
भोपाल। न्याय का असली अर्थ तब सार्थक होता है जब कोई गरीब महज चंद रुपयों की कमी के कारण जेल की सलाखों के पीछे रहने को मजबूर न हो। राजधानी भोपाल सेंट्रल जेल में एक ऐसी ही मानवीय पहल ने सैकड़ों परिवारों के चेहरों पर मुस्कान लौटाई है।
जानकारी के अनुसार जिन कैदियों की सजा पूरी हो चुकी थी, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वे अपना जुर्माना नहीं भर पा रहे थे, उनके लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डालसा) और शहर के समाजसेवी किसी देवदूत से कम साबित नहीं हुए। इनके साझा प्रयासों से अब तक सैकड़ों कैदी जेल की चारदीवारी से बाहर खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं। साल 2023 से 2025 के बीच चले इस विशेष अभियान के तहत कुल 387 कैदियों को रिहा कराया जा चुका है। इस नेक काम में डालसा, स्थानीय वकीलों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने मिलकर कैदियों के जुर्माने की राशि अपनी जेब से भरी। प्रदेश की जेलों में बंद ऐसे गरीब कैदियों और उनके परिवारों के लिए यह पहल एक नई उम्मीद की किरण बनकर आई है।
महज़ 200 रुपए के लिए भी जेल में कट रही ज़िंदगी
समाजसेवियों की इस सराहनीय पहल के बावजूद, स्थिति अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं है। राजधानी भोपाल सेंट्रल जेल में लगभग 600 कैदी ऐसे हैं जिनकी सजा पूरी हो चुकी है, लेकिन जुर्माना न भर पाने के कारण वे अब भी कैदी जीवन जीने को मजबूर हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कुछ मामलों में जुर्माने की राशि मात्र 200 से 400 रुपए ही है, फिर भी गरीबी के कारण इसका भुगतान नहीं हो पा रहा है। वहीं, कई मामले ऐसे भी हैं जहां जुर्माना एक लाख रुपए से अधिक है, जिससे इन कैदियों की रिहाई और भी जटिल हो जाती है।
निरंतर जारी है प्रयास
आर्थिक कारणों से किसी भी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से जेल में न रहना पड़े, इसके लिए समाजसेवियों और विधिक सेवा प्राधिकरण का यह अभियान लगातार जारी है। यह पहल न सिर्फ न्याय प्रणाली के मानवीय चेहरे को उजागर करती है, बल्कि समाज को भी एक-दूसरे की मदद करने का कड़ा संदेश देती है।