Explainer: भारत से युद्ध में पाकिस्तान की मदद करेंगे सऊदी-तुर्किये, क्या है तीन देशों का मक्का रक्षा समझौता?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 08 Aug 2026 07:42 PM IST

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का में एक ऐतिहासिक 'त्रिपक्षीय रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत किसी एक देश पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। जानिए क्या है यह मक्का रक्षा समझौता, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच क्यों बनी यह डील और भारत की सुरक्षा पर इसका क्या असर पड़ेगा?

Mecca Defence Pact 2026: Pak, Saudi Arabia and Turkey Sign Trilateral Defence Agreement Impact on India

तीन देशों के बीच मक्का समझौता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने शुक्रवार को एक साझा रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस्लाम धर्म की मान्यताओं में सबसे पवित्र शहर- मक्का में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोआन ने खुद पहुंचकर इस समझौते के दस्तावेजों में हस्ताक्षर हुए। मक्का में इस डील के होने की वजह से इसे 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' नाम दिया गया है।
इस समझौते की कुछ शर्तों का खुलासा किया गया है। इसमें सबसे प्रमुख शर्त यह है कि अब सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये में से किसी भी एक देश पर किया गया हमला, तीनों देश पर हमला माना जाएगा और ऐसे में इन तीनों ही देशों को एक-दूसरे की मदद के लिए जुटना पड़ेगा। इस समझौते की टाइमिंग भी काफी अहम है। तीनों ही देशों का यह समझौता तब आया है, जब पूरा पश्चिम एशिया अमेरिका-ईरान के युद्ध की आग में झुलस रहा है और खाड़ी के देश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। 
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर तीन इस्लामिक देशों के इस समझौते में क्या कहा गया है और इसकी शर्तें क्या हैं? इस समझौते पर तीनों देशों की ओर से अभी क्यों अंजाम दिया गया? साथ ही इसके पाकिस्तान, सऊदी और तुर्किये के लिए क्या मायने होंगे? क्या यह इस्लामिक देशों के नाटो जैसे गठबंधन बनने की शुरुआत है? भारत के लिए तीनों देशों के समझौते के क्या मायने हैं? आइये जानते हैं...

पहले जानें- क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता, इसकी शर्तें क्या?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर के साथ तीनों ही देशों की तरफ से इसे लेकर एक साझा बयान जारी किया गया है। इसके मुताबिक, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच यह त्रिपक्षीय सुरक्षा और सैन्य समझौता है।
  • समझौते का सबसे केंद्रीय प्रावधान यह है कि इसमें शामिल तीनों ही देशों में से किसी भी एक पर बाहरी देश की तरफ से किया गया हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। 
  • समझौते में कहा गया है कि यह प्रावधान संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (यूएन चार्टर) के अनुच्छेद 51 पर आधारित है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार की गारंटी देता है।
  • तीनों ही देशों की तरफ से इस समझौते का मकसद एक-दूसरे की रक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है, ताकि किसी बाहरी हमले के खिलाफ एकजुटता बनाए रखी जा सके।
  • आधिकारिक तौर पर समझौते में स्पष्ट कहा गया है कि यह कोई धार्मिक, सांप्रदायिक सैन्य गुट या परमाणु तकनीक साझा करने का न तो तंत्र है और न ही इसे बनाने की कोशिश।
  • तीनों देश लगातार रणनीतिक खुफिया जानकारी साझा करने, अभियानों के लिए संयुक्त योजना बनाने, सैन्य कर्मियों की ट्रेनिंग और सैन्य अभ्यासों का औपचारिक ढांचा भी खड़ा करेंगे।
इसके अलावा समझौते में रक्षा क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग, तकनीक के ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन को बढ़ाने की बात कही गई है। इसके तहत ड्रोन्स, नौसैन्य इंजीनियरिंग, वायु रक्षा प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का साझा उत्पादन किया जाएगा। तुर्किये के अधिकारियों के मुताबिक, यह समझौता किसी विशिष्ट देश के खिलाफ केंद्रित नहीं है और भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों, जैसे- कुवैत, बहरीन या कतर के लिए इसमें शामिल होने के रास्ते खुले हैं।

तीनों देशों की ओर से समझौते के लिए क्यों चुना गया यह समय? 

यह समझौता अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही रक्षा वार्ताओं और कई समझौतों का समग्र रूप कहा जा सकता है। सऊदी अरब और पाकिस्तान ने सितंबर 2025 में ही एक द्विपक्षीय रणनीतिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत पाकिस्तान के हजारों सैनिक और हवाई रक्षा प्रणालियां पहले से ही सऊदी अरब में तैनात हैं। इसी तरह तुर्किये और पाकिस्तान भी नौसैनिक परियोजनाओं और ड्रोन सह-उत्पादन में पहले से ही जुड़े हुए थे। अब इन देशों ने अलग-अलग समझौतों को एक साथ जोड़कर साझा तौर पर साथ आने का फैसला किया है।
हालांकि, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान की ओर से मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के एलान की टाइमिंग काफी अहम है। दरअसल, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच पूरा पश्चिम एशिया इस वक्त सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। इतना ही नहीं युद्ध के आगे बढ़ने के साथ ही अमेरिका और ईरान ने इस क्षेत्र में रणनीतिक बदलावों को भी अंजाम दिया है, जिससे क्षेत्र के तीनों ही देश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। 

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मक्का रक्षा समझौता। - फोटो : अमर उजाला
1. ईरान युद्ध और तेल मार्गों पर खतरा 
पश्चिमी एशिया में फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए युद्ध ने पूरे क्षेत्र के सुरक्षा परिदृश्य को बेहद अस्थिर और संवेदनशील बना दिया है। खाड़ी देशों के तेल टर्मिनलों, औद्योगिक परिसरों और शहरी केंद्रों पर लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले हो रहे हैं। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब और लाल सागर जैसे अहम समुद्री व्यापार और ऊर्जा गलियारों में जहाजों की आवाजाही बाधित हुई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
2. हूतियों के हमले और सुरक्षा जोखिम
मक्का शिखर सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले- 6 अगस्त 2026 को यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी सऊदी अरब की सीमा के अंदर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसमें कम से कम 58 यमनी सरकारी सैनिक मारे गए और 11 नागरिक घायल हो गए। इस हमले ने सऊदी सीमाओं पर मंडराते गंभीर खतरों को उजागर कर दिया। इसके साथ ही, सऊदी अधिकारियों को इराक और यमन में सक्रिय ईरान समर्थित समूहों की ओर से एक बड़े हमले की आशंका भी है।
3. अमेरिकी सुरक्षा पर घटता भरोसा
ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य गारंटी पर निर्भर रहा है। लेकिन क्षेत्र में हाल के युद्ध और ईरान के लगातार होते हमलों के दौरान यह देखा गया कि क्षेत्र में अमेरिकी रक्षा क्षमताओं की सीमाएं हैं। इसकी वजह से रियाद और अन्य खाड़ी देशों के मन में अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर गंभीर संदेह पैदा हो गए हैं। सऊदी अरब अब इन्हीं दिक्कतों के मद्देनजर सिर्फ पश्चिमी देशों के भरोसे न रहकर अपने रक्षा भागीदारों का दायरा बढ़ा रहा है।
4. इस्राइल की आक्रामकता और क्षेत्रीय सैन्य विस्तार
ईरान युद्ध के बीच इस्राइल ने लेबनान को निशाना बनाना जारी रखा है और उसके लगभग पांचवें हिस्से पर कब्जा कर लिया है। एक इस्लामिक देश के क्षेत्र में लगातार हो रहे हमले इन तीनों देशों की चिंता का बड़ा कारण बने हैं। तुर्कियो के लिहाज से इस्राइल के साथ बढ़ती दुश्मनी के बीच अपनी सुरक्षा के लिए एक मजबूत सैन्य गठबंधन और सामूहिक रक्षा तंत्र बनाना बेहद जरूरी हो गया था, खासकर तब जब सितंबर 2025 में कतर की राजधानी दोहा पर इस्राइली हवाई हमला हुआ था।

कैसे एक-दूसरे से फायदा हासिल करने की जुगत में तुर्किये, सऊदी और पाकिस्तान?

सऊदी अरब के लिए मायने
अमेरिकी थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल की विशेषज्ञ एलीसन माइनर के मुताबिक, यह समझौता रियाद को मजबूत होते ईरान और उसकी सीमाओं पर लगातार मंडराते हूती जैसे ईरान समर्थित समूहों के खतरों से निपटने के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक बढ़त देता है। उन्होंने कहा कि यह समझौता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सऊदी अरब अब वॉशिंगटन से नाटो जैसी सुरक्षा गारंटी मिलने की उम्मीदें छोड़ चुका है। इसी एवज में सऊदी प्रशासन अब अमेरिका पर अपनी ऐतिहासिक निर्भरता को कम करते हुए अपने क्षेत्रीय रक्षा सहयोगियों को बढ़ाने में जुटा है। 
अशांति और युद्ध के इस दौर में तुर्की जैसी मजबूत सैन्य शक्ति और पाकिस्तान जैसे देश के साथ मिलकर इस ऐतिहासिक समझौते की मेजबानी करके सऊदी अरब खुद को क्षेत्रीय स्थिरता के सबसे विश्वसनीय चेहरे और अग्रणी नेता के रूप में पेश कर रहा है, जबकि वह ईरान और इस्राइल दोनों को क्षेत्र के लिए अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों के रूप में देखता है।

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मक्का रक्षा समझौते पर विशेषज्ञ की राय। - फोटो : अमर उजाला
पाकिस्तान के लिए मायने
  • अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो माइकल कुगलमैन का कहना है कि यह समझौता पाकिस्तान को पश्चिम एशिया की उभरती हुई सुरक्षा व्यवस्था में और ज्यादा गहराई और मजबूती से स्थापित करता है। परमाणु हथियार क्षमता से लैस होने की वजह से त्रिपक्षीय गठबंधन में पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सैन्य प्रभाव काफी बढ़ जाता है।
  • कुगेलमैन का मानना है कि पाकिस्तानी नेता विश्व मंच पर अपनी छवि सुधारना चाहते हैं। वे दुनिया को यह दिखाना चाहते हैं कि उनका देश केवल अस्थिरता या आतंकवाद का सामना करने वाला देश नहीं है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा प्रदान करने वाला एक अहम वैश्विक खिलाड़ी है।
  • पाकिस्तान के लिए पश्चिम एशिया रणनीतिक रूप से भी काफी अहम है, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा (ईंधन) जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर है और यहां लाखों पाकिस्तानी प्रवासी काम करते हैं। इस समझौते के बदले पाकिस्तान को वित्तीय सहायता, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा की ठोस गारंटी मिलती है।
  • ट्रंप प्रशासन जो हमेशा अपने सहयोगियों से सुरक्षा का बोझ साझा करने की मांग करता रहता है, इस ईरान-केंद्रित गठबंधन का स्वागत कर सकता है। इससे अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंधों को रणनीतिक मजबूती मिल सकती है। हालांकि, इस्राइल की सुरक्षा और इस्लामिक देशों के साथ आने को लेकर अमेरिका सतर्कता भी बरतेगा।
तुर्किये के लिए मायने
अटलांटिक काउंसिल के नॉन-रेजिडेंट सीनियर फेलो रिच आउटजेन के मुताबिक, तुर्किये के लिए इस गठबंधन में एक वित्तीय महाशक्ति- सऊदी अरब और एक परमाणु-सशस्त्र देश- पाकिस्तान को शामिल करना इस्राइल के खिलाफ उसकी रक्षात्मक क्षमता को बेहद मजबूत करता है। इस्राइली नेताओं की तरफ से हाल के दिनों में तुर्किये के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने और कतर में हुए हमलों के बाद अंकारा को सामूहिक रक्षा तंत्र की सख्त जरूरत थी।
तुर्किये का घरेलू रक्षा औद्योगिक क्षेत्र काफी आधुनिक और उन्नत है, जो ड्रोन और युद्धपोत जैसी प्रणालियां विकसित करता है। मक्का समझौते के सह-उत्पादन और रक्षा तकनीक हस्तांतरण के ढांचे से तुर्किये के रक्षा उद्योग को सऊदी अरब का जबरदस्त निवेश मिल सकता है। इससे तुर्किये के रक्षा निर्यात और व्यावसायिक मौकों को भारी बढ़ावा मिलेगा। आउटजेन के मुताबिक, यह समझौता भारत से यूरोप तक फैले ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क के बीच तुर्किये की रणनीतिक स्थिति, महत्व और प्रभाव को और जबरदस्त मजबूती देगा।

क्या यह इस्लामिक देशों के नाटो जैसे गठबंधन बनने की शुरुआत है?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर इस्लामिक देशों के नाटो जैसी चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि इसके मूल प्रावधान में 'एक पर हमला, सभी पर हमला' जैसी सामूहिक सुरक्षा की नाटो-शैली जैसी शर्त शामिल है। हालांकि, आधिकारिक बयानों और रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल जिन तीन देशों का गठबंधन बना है, उसमें सभी की अपनी-अपनी चाहत हैं। इसे अभी एक पूर्ण 'इस्लामिक नाटो' कहना जल्दबाजी होगी। 
नाटो जैसा ढांचा खड़ा करना सबसे बड़ी चुनौती
नाटो के उलट इस समझौते में कोई केंद्रीकृत एकीकृत सैन्य कमान ढांचा, साझा वैश्विक मुख्यालय या स्थायी रूप से तैनात संयुक्त सैन्य बल शामिल नहीं हैं। यह मुख्य रूप से एक उच्च-स्तरीय बाध्यकारी राजनीतिक और रणनीतिक संधि के रूप में काम करता है, जो संकट के समय सैन्य बलों के तत्काल साथ आने को सक्षम बनाता है। दूसरी तरफ नाटो के पास सात दशकों से ज्यादा समय से एकीकृत कमान ढांचा, जंग से जुड़े सिद्धांत, साझा रसद नेटवर्क और स्थायी सैन्य बुनियादी ढांचा है। 
अपनी-अपनी प्राथमिकताओं वाले देश गठबंधन में शामिल
त्रिपक्षीय गठबंधन के तीनों सदस्य देशों का अपना अलग सुरक्षा दायरा, इसे नाटो गठबंधन की तरह बनने से खास तौर पर रोकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों देशों की बिल्कुल अलग सैन्य प्राथमिकताएं इसके साथ आने में मुश्किल पैदा करती हैं।

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मक्का रक्षा समझौता। - फोटो : अमर उजाला
तुर्किये: नाटो का एक अहम सदस्य बना हुआ है और उसका ध्यान खास तौर पर भूमध्य सागर और लेवांत क्षेत्र पर केंद्रित है। 
सऊदी अरब: इसकी सुरक्षा चिंताएं मुख्य रूप से फारस की खाड़ी, लाल सागर और हूती विद्रोहियों जैसे खतरों तक सीमित हैं।
पाकिस्तान: सैन्य ध्यान और रक्षा ढांचा पारंपरिक रूप से भारत, दक्षिण एशिया और अपनी पूर्वी सीमा की ओर केंद्रित है।
गौरतलब है कि इस्लामिक नाटो की चर्चा कोई नई नहीं है। साल 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में 41 देशों का इस्लामिक सैन्य आतंकवाद विरोधी गठबंधन बनाया गया था। लेकिन वह गठबंधन मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी अभियानों तक सीमित रहा। इससे इतर मक्का समझौता फिलहाल सिर्फ तीन विशिष्ट सैन्य शक्तियों का एक व्यावहारिक रणनीतिक कदम है।
जर्मन मार्शल फंड (यूएस) के दक्षिण और व्यापक यूरोप कार्यालय के प्रबंध निदेशक और तुर्किये के क्षेत्रीय निदेशक ओजगुर उनलुहिसासिकली का कहना है कि यह रक्षा समझौता तीनों देशों की बढ़ती क्षेत्रीय रणनीतिक स्वायत्तता की इच्छा को दर्शाता है। वह भी ऐसे समय जब मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था में विश्वास कम हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह तीन प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्तियों के बीच घनिष्ठ रणनीतिक, सैन्य और रक्षा-औद्योगिक समन्वय का एक ढांचा है, न कि नाटो जैसा कोई रक्षा समझौता।" 

भारत के लिए तीनों देशों के समझौते के क्या मायने हैं?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता पर भारत की भी करीबी नजर बनी हुई है। हालांकि, इस समझौते पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया बेहद संतुलित और कूटनीतिक रही है। हाल ही में एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "यह एक ऐसा घटनाक्रम है जिस पर हम बारीकी से नजर रख रहे हैं, और हम आपको अपडेट रखेंगे।"  यह दर्शाता है कि भारत इस त्रिपक्षीय सैन्य तालमेल को हल्के में नहीं ले रहा है। इसकी मुख्य तौर पर पांच वजहें हैं
  • भारतीय रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह संधि पाकिस्तान को कूटनीतिक सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता और अतिरिक्त कूटनीतिक बढ़त देती है। भविष्य में भारत के साथ किसी टकराव में पाकिस्तान तुर्किये और सऊदी अरब से कूटनीतिक या रणनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकता है, जिससे दक्षिण एशिया में भारत के पारंपरिक सुरक्षा संतुलन के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
  • तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान को कई आधुनिक सैन्य उपकरण देता रहा है, जिसमें हथियारबंद ड्रोन्स, स्टील्थ तकनीक से लैस कोर्वेट पोत और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक तकनीक शामिल हैं। हालांकि, भारत ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये के सहयोग के बावजूद पाकिस्तान की क्षमताओं को नेस्तानाबूत कर चुका है। ऐसे में तुर्किये का पाकिस्तान के साथ आना भारत के लिए खास चिंता का मुद्दा नहीं है।
  • भारत के लिए असल चिंता की बात पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब का जुड़ना है। दरअसल, सऊदी की भारी पूंजी का निवेश तुर्किये और पाकिस्तान के संयुक्त रक्षा उपक्रमों में हो सकता है। यह निवेश पाकिस्तान की सेना के आधुनिकीकरण को जबरदस्त रूप से तेज कर सकता है, जिसका सीधा असर भारत की पश्चिमी सीमा की सैन्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।

क्या भारत इस स्थिति से निपटने में सक्षम?                                               1. सऊदी के साथ लगातार बेहतर हुए रिश्ते

भारत ने पिछले दो दशकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच व्यक्तिगत कूटनीति के जरिए रियाद के साथ बेहद मजबूत रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध स्थापित किए हैं। सऊदी अरब भारत को कच्चे तेल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की आपूर्ति करने वाले शीर्ष देशों में से एक है, जो भारत की घरेलू ऊर्जा जरूरतों के लिए अनिवार्य है। इसके अलावा नई दिल्ली और रियाद के बीच आतंकवाद विरोधी अभियानों, मनी लॉन्ड्रिंग और कट्टरपंथ से निपटने के लिए उच्च स्तरीय और प्रभावी खुफिया जानकारी साझा करने का तंत्र मौजूद है। 
इतना ही नहीं सऊदी अरब 'इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर' (आईएमईसी) का एक खास और अहम भागीदार है। यानी दोनों ही देश पहले से ही काफी करीब हैं और पाकिस्तान से उसके समझौते का असर कम ही होने की संभावना है। विश्लेषकों के मुताबिक, भारतीय राजनयिकों और चैनलों को यह सुनिश्चित करने के लिए काम करना होगा कि सऊदी अरब की त्रिपक्षीय समझौते के प्रति प्रतिबद्धता सिर्फ पश्चिम एशियाई संकटों, जैसे ईरान संघर्ष तक ही सीमित रहें और वे नई दिल्ली-रियाद के मजबूत द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित न करें।
2. नौसैनिक परिवहन पर ध्यान रखना जरूरी
भारत का विदेश से होने वाला अधिकतर व्यापार और ऊर्जा आयात अरब सागर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब-अल-मंदेब के समुद्री मार्गों से होता है। इस नए सैन्य समझौते के तहत पाकिस्तान खाड़ी देशों और विशेष रूप से सऊदी अरब में अपनी नौसैनिक और हवाई उपस्थिति का विस्तार करने की तैयारी में है। ऐसे में भारत के लिए यह सुनिश्चित करना बेहद अहम हो जाता है कि पश्चिमी हिंद महासागर में भारतीय वाणिज्यिक जहाजों, तेल टैंकरों और नौसेना की स्वतंत्र आवाजाही बिना किसी बाधा के सुरक्षित रहे और किसी गठबंधन की मनमानी इसके आड़े न आए।

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