सितंबर की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के वफ़ादार बल, हूती विद्रोहियों के औचक हमले के सामने टिक न सके.
इसके साथ ही सऊदी अरब के क़रीब एक दशक के सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक प्रयास कुछ ही दिनों में बिखरते दिखाई दिए.
हूती विद्रोही ने लाल सागर के यमनी तट के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट की ओर बढ़ गए.
यह लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच एक रणनीतिक प्रवेश द्वार है और बीते फ़रवरी के आख़िर में होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने के बाद से यह सऊदी अरब के तेल निर्यात और व्यापार के लिए सबसे अहम रास्ता बन गया है.
हूती विद्रोहियों की ओर से 'सऊदी दुश्मन' के ख़िलाफ़ समुद्री नाकाबंदी का एलान किए जाने के कुछ ही हफ़्तों बाद उन्हें ये बढ़त मिली.
इसके बाद सऊदी शहरों और एनर्जी फ़ैसेलिटीज़ को निशाना बनाकर ड्रोन और मिसाइल हमले किए गए. ईरान समर्थित इराक़ी मिलिशिया ने भी हमलों की ज़िम्मेदारी ली.
रियाद में गल्फ़ इंटरनेशनल फ़ोरम के रिसर्चर डॉ. अब्दुल अज़ीज़ अल-ग़शयान का मानना है कि 'हालात ऐसे बुरे ख़्वाब जैसे हैं, जो हक़ीक़त में बदल गए.'
उनके अनुसार, "देश की आर्थिक जीवनरेखा, तेल निर्यात, को गंभीर नुक़सान पहुंच रहा है."
होर्मुज़ स्ट्रेट पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद सऊदी अरब कच्चे तेल को लाल सागर के बंदरगाह यनबू तक पहुंचाने के लिए ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ज़्यादा निर्भर हो गया है.
ओपेक के मुताबिक, सऊदी अरब का 80 फ़ीसदी तेल निर्यात एशियाई बाज़ारों में जाता है. इससे बाब अल-मंदेब स्ट्रेट की रणनीतिक अहमियत बहुत बढ़ जाती है.
हालांकि, पिछले दो हफ़्तों में हूती बलों ने स्ट्रेट के पास मोखा और धुबाब शहरों में सरकारी ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया और स्ट्रेट के बीच स्थित रणनीतिक पेरिम द्वीप, जिसे मायून द्वीप भी कहा जाता है, पर अपना नियंत्रण मज़बूत कर लिया है.
हूती विद्रोहियों का पहले से ही उत्तरी यमन के ज़्यादातर हिस्से पर नियंत्रण था. यह इलाक़ा सऊदी अरब की सीमा से लगा हुआ है और यहां राजधानी सना से चलने वाली एक प्रशासनिक व्यवस्था है.

साल 2015 में सऊदी अरब ने यमन में एक गठबंधन की अगुवाई की. इस गठबंधन ने हज़ारों हवाई हमले किए. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, इन हमलों में हज़ारों आम नागरिक मारे गए, जिसके चलते व्यापक आलोचना हुई.
साल 2021 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन ने यमन में सैन्य अभियानों के लिए अमेरिकी समर्थन बंद करने का एलान किया. इसमें हथियारों की बिक्री भी शामिल थी.
रिपोर्टों के मुताबिक, लड़ाई में क़रीब डेढ़ लाख लोग मारे गए हैं और भारी मानवीय तबाही हुई है. इसके चलते 48 लाख लोग विस्थापित हुए हैं और देश की आधी आबादी, 1 करोड़ 95 लाख यमनी लोगों को मदद की ज़रूरत है.
साल 2022 में संघर्ष विराम के बाद यमन में कई साल तक शांति रही.
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की डॉ. एलिज़ाबेथ केंडल ने कहा, "आज हम सिर्फ़ ऐसे आंदोलन को नहीं देख रहे हैं जिसके पास अनुभव, अनुशासन और संगठन है, बल्कि वह संदेश पहुंचाने और टार्गेट तय करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है."
सऊदी और अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान पर हूती विद्रोहियों तक ड्रोन, क्रूज़ मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल समेत हथियारों की तस्करी करने का आरोप लगाया है. यह संयुक्त राष्ट्र के हथियार प्रतिबंध का साफ़ उल्लंघन है. ईरान इससे इनकार करता है. उसका कहना है कि उसका समर्थन पूरी तरह राजनीतिक है.
लेकिन इटालियन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्टडीज़ के मुताबिक़, ईरान ने हूती विद्रोहियों को यमन में ड्रोन बनाने की फ़ैसिलिटीज़ बनाने में मदद की.
अमेरिका की मिलिट्री अकादमी, वेस्ट पॉइंट के कॉम्बैटिंग टेररिज़्म इंस्टीट्यूट के मुताबिक़, हूती विद्रोहियों को लेबनान के समूह हिज़्बुल्लाह से सलाह और सैन्य सपोर्ट भी मिला है.
हूती इस दावे को ख़ारिज करते हैं कि वे ईरान के एजेंडे पर काम कर रहे हैं.
चैटम हाउस के शोधकर्ता फ़रिया अल-मुस्लिमी का कहना है कि बाब अल-मंदेब की ओर हूती विद्रोहियों की बढ़त ने ईरान की स्थिति को मज़बूत किया है, "अब अमेरिका के साथ बातचीत में ईरान की स्थिति ज़्यादा मज़बूत है."
लेकिन केंडल का कहना है, "बिना ईरान के भी हूती वही करते रहेंगे, जो कर रहे हैं, क्योंकि उनके अपने मक़सद और लक्ष्य हैं. इस समय ये मक़सद पैसे, प्रभाव और दबदबे और आख़िरकार राजनीतिक मान्यता पर केंद्रित हैं."
उन्होंने कहा, "ईरान के हथियार, प्रशिक्षण और ख़ुफ़िया सहयोग के बिना हूती इस स्तर पर काम नहीं कर सकते, लेकिन यह अभी साफ़ नहीं है कि ईरान हूती विद्रोहियों को सीधे तौर पर आदेश और नियंत्रण देता है या नहीं."
इमेज स्रोत, AFPTV / AFP via Getty Images इमेज कैप्शन, यह तस्वीर आठ सितंबर की है जब तैज़ प्रांत में सऊदी समर्थित सरकारी बलों और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष बढ़ गया
बाइडन ने जनवरी 2021 में पद संभालते ही हूती विद्रोहियों को विदेशी आतंकवादी संगठनों की अमेरिकी सूची से हटा दिया था. पिछले साल जनवरी में राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें फिर इस सूची में डाल दिया.
लेकिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल में बताया कि वॉशिंगटन ने यमन में हाल के घटनाक्रम को लेकर हूती विद्रोहियों के साथ बातचीत की थी. उन्होंने कहा कि अमेरिका पेरिम द्वीप पर नियंत्रण को लेकर चिंतित है और घटनाक्रम पर क़रीबी नज़र रख रहा है.
इससे पहले ट्रंप ने कहा था कि हूती विद्रोहियों ने वॉशिंगटन से यमन में दख़ल न देने को कहा है और वे अमेरिका के साथ सैन्य टकराव नहीं चाहते.
14 सितंबर को अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर सऊदी अरब गए और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात की.
सीएनएन ने सूत्रों के हवाले से बताया कि मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से दो बार बात की और उनसे हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य हमले का आदेश देने को कहा, लेकिन उनकी मांग को ख़ारिज कर दिया गया.
अल-ग़शयान का कहना है कि सऊदी अरब अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को लेकर पहले से असुरक्षा महसूस रहा है और ताज़ा घटनाक्रम इसे और बढ़ाएगा.
सऊदी लगातार उस बात पर ज़ोर देता रहा है, जिसे वह अपनी संप्रभुता, अपने नागरिकों और अपने अहम हितों की रक्षा का जायज़ हक़ बताता है. वहीं, हूती विद्रोहियों का आरोप है कि सऊदी अरब ने हाल के दिनों में यमन में ठिकानों पर दर्जनों हवाई हमले किए हैं.
हूती विद्रोहियों के प्रवक्ता मोहम्मद अब्दुल सलाम ने कहा कि हाल में किए गए उनके अभियान अंतरराष्ट्रीय नौपरिवहन के लिए ख़तरा नहीं हैं और जैसे ही सऊदी अरब यमन के ख़िलाफ़ नाकाबंदी को हटा देगा और देश पर हमले बंद हो जाएंगे, वे हमले रोक देंगे.
उन्होंने कहा, "लाल सागर और बाब अल-मंदेब में नौपरिवहन की आज़ादी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार सुरक्षित और सामान्य हैं."
केंडल ने कहा, "हूती अपने मीडिया बयानों को लेकर बहुत सावधान रहे हैं, क्योंकि उन्हें संयुक्त अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभियान का डर है."
इमेज स्रोत, Mohammed HUWAIS / AFP via Getty Images इमेज कैप्शन, यमन के सना में 10 सितंबर को हूती विद्रोहियों ने रैली की थी
ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल संघर्ष के दौरान सऊदी अरब को ईरान की ओर से दर्जनों मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया गया. सऊदी अधिकारियों ने कहा कि संघर्ष विराम का एलान होने के बाद भी इराक़ में ईरान समर्थित मिलिशिया के साथ-साथ हूती विद्रोहियों के हमले जारी रहे.
11 सितंबर को सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने ईस्ट-वेस्ट कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया. इस पाइपलाइन पर उन ड्रोन से हमला किया गया था. माना गया कि ये ड्रोन हमले दक्षिणी इराक़ से लॉन्च किए गए थे.
सऊदी अरब इस समय एक बेहद जटिल दुविधा का सामना कर रहा है.
हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की सफलता की गारंटी नहीं है, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच 2015 से 2022 तक चले संघर्ष का अनुभव सामने है.
इसके लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की भी ज़रूरत होगी, जो इस समय नहीं है. इसके साथ ही इसमें बड़े जोखिम हो सकते हैं, हूती विद्रोहियों की ड्रोन और मिसाइल क्षमता को देखते हुए.
अल-मुस्लिमी ने कहा, "यमन की भौगोलिक स्थिति, उसकी मानवीय और सामाजिक विशेषताएं, हथियारों की व्यापक उपलब्धता, सराकरी संस्थाओं की कमज़ोरी और प्रभाव डालने में सक्षम किसी मज़बूत घरेलू सहयोगी की कमी- ये सारी बातें यमन में किसी भी सैन्य हस्तक्षेप को मुश्किल, बल्कि असंभव तक बना देती हैं."
अल-ग़शयान का कहना है, "सऊदी लोग खुद को अलग-थलग महसूस करने के बजाय ज़्यादा बोझ में दबा हुआ महसूस करते हैं. हम ऐसे क्षेत्र का हिस्सा हैं, जो एक ही समय में कई संकटों का सामना कर रहा है. कई मोर्चों पर आग लगी हुई है और उन सभी से एक ही समय में निपटना बेहद मुश्किल है."
अंसार अल्लाह के लड़ाके बाब अल-मंदेब पर अपनी पकड़ मज़बूत करते जा रहे हैं और सऊदी को यह चिंता सता रही है कि आज कार्रवाई में देरी करना, कहीं भविष्य में इसे असंभव न बना दे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
बाइडन ने जनवरी 2021 में पद संभालते ही हूती विद्रोहियों को विदेशी आतंकवादी संगठनों की अमेरिकी सूची से हटा दिया था. पिछले साल जनवरी में राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें फिर इस सूची में डाल दिया.
लेकिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल में बताया कि वॉशिंगटन ने यमन में हाल के घटनाक्रम को लेकर हूती विद्रोहियों के साथ बातचीत की थी. उन्होंने कहा कि अमेरिका पेरिम द्वीप पर नियंत्रण को लेकर चिंतित है और घटनाक्रम पर क़रीबी नज़र रख रहा है.
इससे पहले ट्रंप ने कहा था कि हूती विद्रोहियों ने वॉशिंगटन से यमन में दख़ल न देने को कहा है और वे अमेरिका के साथ सैन्य टकराव नहीं चाहते.
14 सितंबर को अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर सऊदी अरब गए और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात की.
सीएनएन ने सूत्रों के हवाले से बताया कि मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से दो बार बात की और उनसे हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य हमले का आदेश देने को कहा, लेकिन उनकी मांग को ख़ारिज कर दिया गया.
अल-ग़शयान का कहना है कि सऊदी अरब अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को लेकर पहले से असुरक्षा महसूस रहा है और ताज़ा घटनाक्रम इसे और बढ़ाएगा.
सऊदी लगातार उस बात पर ज़ोर देता रहा है, जिसे वह अपनी संप्रभुता, अपने नागरिकों और अपने अहम हितों की रक्षा का जायज़ हक़ बताता है. वहीं, हूती विद्रोहियों का आरोप है कि सऊदी अरब ने हाल के दिनों में यमन में ठिकानों पर दर्जनों हवाई हमले किए हैं.
हूती विद्रोहियों के प्रवक्ता मोहम्मद अब्दुल सलाम ने कहा कि हाल में किए गए उनके अभियान अंतरराष्ट्रीय नौपरिवहन के लिए ख़तरा नहीं हैं और जैसे ही सऊदी अरब यमन के ख़िलाफ़ नाकाबंदी को हटा देगा और देश पर हमले बंद हो जाएंगे, वे हमले रोक देंगे.
उन्होंने कहा, "लाल सागर और बाब अल-मंदेब में नौपरिवहन की आज़ादी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार सुरक्षित और सामान्य हैं."
केंडल ने कहा, "हूती अपने मीडिया बयानों को लेकर बहुत सावधान रहे हैं, क्योंकि उन्हें संयुक्त अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभियान का डर है."
इमेज स्रोत, Mohammed HUWAIS / AFP via Getty Images इमेज कैप्शन, यमन के सना में 10 सितंबर को हूती विद्रोहियों ने रैली की थी
ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल संघर्ष के दौरान सऊदी अरब को ईरान की ओर से दर्जनों मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया गया. सऊदी अधिकारियों ने कहा कि संघर्ष विराम का एलान होने के बाद भी इराक़ में ईरान समर्थित मिलिशिया के साथ-साथ हूती विद्रोहियों के हमले जारी रहे.
11 सितंबर को सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने ईस्ट-वेस्ट कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया. इस पाइपलाइन पर उन ड्रोन से हमला किया गया था. माना गया कि ये ड्रोन हमले दक्षिणी इराक़ से लॉन्च किए गए थे.
सऊदी अरब इस समय एक बेहद जटिल दुविधा का सामना कर रहा है.
हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की सफलता की गारंटी नहीं है, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच 2015 से 2022 तक चले संघर्ष का अनुभव सामने है.
इसके लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की भी ज़रूरत होगी, जो इस समय नहीं है. इसके साथ ही इसमें बड़े जोखिम हो सकते हैं, हूती विद्रोहियों की ड्रोन और मिसाइल क्षमता को देखते हुए.
अल-मुस्लिमी ने कहा, "यमन की भौगोलिक स्थिति, उसकी मानवीय और सामाजिक विशेषताएं, हथियारों की व्यापक उपलब्धता, सराकरी संस्थाओं की कमज़ोरी और प्रभाव डालने में सक्षम किसी मज़बूत घरेलू सहयोगी की कमी- ये सारी बातें यमन में किसी भी सैन्य हस्तक्षेप को मुश्किल, बल्कि असंभव तक बना देती हैं."
अल-ग़शयान का कहना है, "सऊदी लोग खुद को अलग-थलग महसूस करने के बजाय ज़्यादा बोझ में दबा हुआ महसूस करते हैं. हम ऐसे क्षेत्र का हिस्सा हैं, जो एक ही समय में कई संकटों का सामना कर रहा है. कई मोर्चों पर आग लगी हुई है और उन सभी से एक ही समय में निपटना बेहद मुश्किल है."
अंसार अल्लाह के लड़ाके बाब अल-मंदेब पर अपनी पकड़ मज़बूत करते जा रहे हैं और सऊदी को यह चिंता सता रही है कि आज कार्रवाई में देरी करना, कहीं भविष्य में इसे असंभव न बना दे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.