केन-बेतवा परियोजना, मुआवजे में हेराफेरी और पुलिसिया दमन के आरोप

Rajendra Parasar
 केन-बेतवा परियोजना, मुआवजे में हेराफेरी और पुलिसिया दमन के आरोप
नेता प्रतिपक्ष ने ग्राम सभाओं की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
भोपाल। महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना एक बार फिर विवादों के घेरे में है। राजधानी भोपाल में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस 44 हजार करोड़ की परियोजना से जुड़े ऐसे सनसनीखेज दस्तावेजी तथ्य और ग्रामीण परिवारों की शिकायतें सामने रखी हैं, जिसने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सिंघार ने सीधे तौर पर परियोजना में ग्राम सभा प्रक्रिया, मुआवजे के वितरण और ठेका आवंटन में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है।
नेता प्रतिपक्ष ने 14 जुलाई को छतरपुर जिले के कूपी में प्रभावित ग्रामीणों से मुलाकात के बाद जो खुलासे किए, वे चौंकाने वाले हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि रतिया, करी, खटवानी समेत सात ग्राम पंचायतों के कार्यवाही रजिस्टरों में समान भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इतना ही नहीं, खरिहानी ग्राम पंचायत के रिकॉर्ड में ऐसे व्यक्ति के हस्ताक्षर पाए गए, जिसने पदभार छह माह बाद ग्रहण किया था। सिंघार ने इसे घोस्ट हस्ताक्षर कांड करार देते हुए प्रशासनिक मिलीभगत का अंदेशा जताया है।
अधिकारों का दमन
सिंघार ने आरोप लगाया कि वास्तविक प्रभावित आदिवासी परिवार दर-दर भटक रहे हैं, जबकि लगभग 8 करोड़ रुपये का मुआवजा उन लोगों को बांट दिया गया, जिनका गांव से दशकों से कोई लेना-देना नहीं है। सुकवाहा गांव की सुमता रानी जैसे अनेक आदिवासी इस बात के भुक्तभोगी हैं कि उनकी जमीनें दूसरों के नाम कर मुआवजा हड़प लिया गया। यही नहीं, परियोजना के विरोध में आवाज उठाने वाले आदिवासियों पर पुलिसिया दमन का आरोप भी लगा है। सिंघार के अनुसार, लाठीचार्ज और जबरन वसूली जैसी घटनाओं के जरिए आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई है। साथ ही, उन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड और ठेका आवंटन के बीच संबंध पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या 60 करोड़ के चंदे के बदले 3,400 करोड़ का ठेका दिया गया?
निष्पक्ष जांच कराए सरकार
नेता प्रतिपक्ष ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि परियोजना के नाम पर आदिवासियों के अधिकारों का हनन बंद हो। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए मुख्यमंत्री से कैबिनेट की बैठक प्रभावित क्षेत्र में आयोजित करने को कहा है, ताकि वे खुद जनता का दर्द देख सकें। फिलहाल, इन आरोपों ने सरकार के विकास के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं।

 छानबीन समिति के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देगी कांग्रेस
कांग्रेस का दावा, सरकार के दबाव में समिति ने शासकीय दस्तावेजों को किया नजरअंदाज
भोपाल। राज्य स्तरीय छानबीन समिति द्वारा अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को वैध ठहराए जाने के बाद भी मध्य प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी की मुश्किलें कम होती दिखाई नहीं दे रही हैं। उच्च स्तरीय समिति के इस फैसले को कांग्रेस ने सरकार के दबाव में लिया गया निर्णय करार दिया है। मामले के मुख्य शिकायतकर्ता और मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने इस क्लीन चिट पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए मामले को न्यायपालिका की दहलीज पर ले जाने का एलान किया है।
प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि जब मामले की जांच चल रही थी, तब मंत्री प्रतिमा बागरी अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिली थीं। कांग्रेस का आरोप है कि इस मुलाकात के बाद ही जांच की दिशा को प्रभावित किया गया। कांग्रेस नेता ने दावा किया कि उच्च स्तरीय समिति ने निर्णय लेते समय कई ऐतिहासिक और शासकीय दस्तावेजों की पूरी तरह अनदेखी की है। यदि इन दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष जांच होती, तो फैसला अलग होता। अनुसूचित जाति आदेश 1950 के तहत प्रतिमा बागरी जिस मूल क्षेत्र से आती हैं, वहां बागरी समुदाय अनुसूचित जाति की सूची में शामिल ही नहीं था। 1961 और 1971 की दोनों जनगणनाओं के रिकॉर्ड के अनुसार, संबंधित परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट की मानवशास्त्रीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए कांग्रेस ने कहा कि इसमें विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समुदाय को राजपूत ठाकुर की उपजाति बताया गया है। समिति ने वर्ष 2007 के शासकीय राजपत्र के महत्वपूर्ण तथ्यों को भी अपने निर्णय में उचित महत्व नहीं दिया।
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई लड़ेगी कांग्रेस
कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह इस क्लीन चिट को स्वीकार नहीं करेगी। प्रदीप अहिरवार ने कहा कि छानबीन समिति गलत तथ्यों के आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंची है। इसलिए इस फैसले के खिलाफ जल्द ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की जाएगी। अगर जरूरत पड़ी, तो न्याय के लिए कांग्रेस इस कानूनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट तक लेकर जाएगी।

 निधि चतुर्वेदी सहित चार नेताओं पर हो सकती है अनुशासनात्मक कार्रवाई
कांग्रेस अनुशासन समिति की बैठक अगले सप्ताह
भोपाल। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलकर विवादों में आईं प्रदेश कांग्रेस की महामंत्री निधि चतुर्वेदी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पार्टी की अनुशासन समिति अगले सप्ताह एक महत्वपूर्ण बैठक करने जा रही है, जिसमें निधि चतुर्वेदी के कड़े तेवर और उनके कानूनी जवाब पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। इस बैठक में निधि के अलावा कांग्रेस की अन्य नेता प्रियंका किरार सहित तीन अन्य नेताओं के भाग्य का फैसला भी होना है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब प्रदेश कांग्रेस महामंत्री निधि चतुर्वेदी ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लेकर सोशल मीडिया पर एक विवादित पोस्ट साझा की थी। कांग्रेस संगठन ने इसे अनुशासनहीनता माना और प्रदेश कांग्रेस के संगठन महामंत्री संजय कामले ने तत्काल कार्रवाई करते हुए निधि को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। आमतौर पर नोटिस मिलने के बाद जहां नेता नरम रुख अपनाते हैं, वहीं निधि चतुर्वेदी ने डॉ. संजय कामले को बेहद कड़ा और वैधानिक (लीगल) जवाब भेजकर सबको चौंका दिया। अपने जवाब में निधि ने सीधे संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि कामले किस विधिक या संवैधानिक हैसियत से उन्हें नोटिस जारी कर रहे हैं? इसके साथ ही उन्होंने नोटिस के विरोध में नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई अमल में लाने की चेतावनी भी दे डाली।
संगठन ने अनुशासन समिति को भेजा मामला
निधि के इस आक्रामक और कानूनी जवाब के बाद कांग्रेस आलाकमान ने मामले को गंभीरता से लिया है। पार्टी ने तय किया है कि अब इस पूरे प्रकरण को सीधे अनुशासन समिति के पास भेजा जाएगा। विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह की अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति अगले सप्ताह बैठक करेगी। इस बैठक में समिति निधि चतुर्वेदी और प्रियंका किरार सहित चारों नेताओं के मामलों की समीक्षा करेगी। समिति अपनी जांच और चर्चा के बाद अपनी अंतिम अनुशंसा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी को सौंपेगी। इसके बाद अनुशासन समिति की सिफारिशों के आधार पर प्रदेश अध्यक्ष इन चारों नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का अंतिम फैसला लेंगे।

 टीईटी की अनिवार्यता से शिक्षकों में बढ़ा असंतोष, पदोन्नति पर मंडराए संकट के बादल
संयुक्त संचालक के पत्र से प्रदेशभर के शिक्षकों में भ्रम की स्थिति
भोपाल। प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता को लेकर पहले से ही नौकरी संबंधी चुनौतियों से जूझ रहे शिक्षकों के सामने अब पदोन्नति को लेकर भी नई आशंका खड़ी हो गई है। संयुक्त संचालक, लोक शिक्षण भोपाल द्वारा जारी एक पत्र के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि अब केवल टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों को ही पदोन्नति का लाभ दिया जाएगा। इस पत्र के सामने आने के बाद से प्रदेशभर के शिक्षक संवर्ग में भ्रम और गहरी नाराजगी का माहौल है।
जानकारी के अनुसार, आयुक्त लोक शिक्षण की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में मिले निर्देशों के बाद संयुक्त संचालक ने मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 के तहत प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। इसके तहत भोपाल संभाग के सभी जिला शिक्षा अधिकारियों  से कार्यरत सहायक शिक्षकों और प्राथमिक शिक्षकों में से केवल टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों की विस्तृत जानकारी मांगी गई है। साथ ही विषयवार व संवर्गवार रिक्त पदों का प्रामाणिक विवरण भी तत्काल तलब किया गया है।
संगठन ने विधिक आधार पर उठाए सवाल
इस आदेश के बाद शासकीय शिक्षक संगठन खुलकर विरोध में आ गया है। संगठन के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कौशल ने विभाग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग जिलों में भिन्न प्रकार से जानकारी मांगे जाने के कारण शिक्षकों में अनावश्यक भ्रम फैल रहा है। यदि पदोन्नति में टीईटी की शर्त जोड़ी जा रही है, तो विभाग इसका विधिक और प्रशासनिक आधार स्पष्ट करे। जब तक शासन के स्पष्ट निर्देश न आएं, तब तक भ्रम पैदा करने वाली इस प्रक्रिया पर रोक लगनी चाहिए। शिक्षक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि नीति स्पष्ट नहीं की गई, तो प्रदेश स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

 दतिया का चुनावी दंगल, सफर में मंगल !
चुनावी बयानों में तीखे वार, पर ट्रेन के डिब्बे में सिर्फ मुस्कुराती हुई तकरार
भोपाल। चुनावी समर की तपिश के बीच जब दो कट्टर सियासी प्रतिद्वंद्वी एक ही बंद डिब्बे में आमने-सामने आ जाएं, तो कयासों के पहिए रफ्तार पकड़ ही लेते हैं। दतिया विधानसभा उपचुनाव की दहकती सियासत के बीच कुछ ऐसा ही दिलचस्प नजारा देखने को मिला, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चुनाव प्रचार की कमान संभालने निकले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और कांग्रेस के सूबेदार जीतू पटवारी न सिर्फ एक ही ट्रेन से दतिया पहुंचे, बल्कि सफर के दौरान दोनों के बीच मुलाकातों और मुस्कुराहटों का एक लंबा दौर भी चला।
दतिया के रण में अपनी-अपनी सेनाओं को धार देने निकले दोनों सेनापति जब ट्रेन की एक ही बोगी में आमने-सामने हुए, तो चुनावी कड़वाहट पल भर के लिए काफूर हो गई। अमूमन मंचों से एक-दूसरे पर तीखे शब्दबाण चलाने वाले इन दोनों दिग्गजों के बीच ट्रेन के डिब्बे में काफी देर तक अनौपचारिक गुफ्तगू हुई। हालांकि, ट्रेन के डिब्बे हुई बातचीत में क्या सियासी खिचड़ी पकी, इसका आधिकारिक खुलासा तो दोनों ही खेमों ने नहीं किया है, लेकिन इस मुलाकात की जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, वे बिना कुछ कहे बहुत कुछ बयां कर रही हैं।
रूठों को मनाने और समीकरण साधने की जंग
यह दिलचस्प मुलाकात उस वक्त हुई है जब दतिया उपचुनाव दोनों ही दलों के लिए साख का सवाल बन चुका है। हेमंत खंडेलवाल खुद मोर्चा संभालकर न केवल कार्यकर्ताओं में जोश फूंक रहे हैं, बल्कि नाराज नेताओं को मनाने और डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। वहीं जीतू पटवारी जातीय समीकरणों को अपने पक्ष में करने और जमीनी स्तर पर वोटर्स को साधने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।
मतभेद अपनी जगह, मनभेद नहीं
चुनावी बयानों के तीखे तीरों और हर रोज होने वाले सियासी टकराव के बीच, सफर की यह एक तस्वीर लोकतंत्र की बेहद खूबसूरत और परिपक्व मिसाल पेश करती है। यह बताती है कि राजनीति में वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन व्यक्तिगत संवाद और शिष्टाचार की भारतीय परंपरा आज भी जिंदा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि दतिया के इस सियासी ट्रैक पर तेजी से दौड़ रही दोनों दलों की चुनावी एक्सप्रेस में से किसकी गाड़ी आखिरकार जीत के स्टेशन पर सबसे पहले हरी झंडी दिखाएगी।

 लंबी बैठकों पर लगेगी लगाम, फाइलों के निपटारे में आएगी तेजी
भोपाल। केंद्र सरकार ने देश की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक चुस्त-दुरुस्त और परिणामोन्मुख बनाने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक सर्जरी-नुमा कदम उठाया है। सरकार ने अखिल भारतीय सेवाओं (आईएएस, आईपीएस और आईएफएस) के अधिकारियों की कार्यप्रणाली में आमूलचूल बदलाव के निर्देश जारी किए हैं।
नए निर्देशों के तहत अब लालफीताशाही को खत्म करने और निर्णय प्रक्रिया को रफ्तार देने के लिए अधिकारियों को लंबी और गैर-जरूरी बैठकों से बचने की सख्त सलाह दी गई है। सरकार का मुख्य फोकस मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस के तहत प्रशासनिक जवाबदेही तय करना है। केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में साफ किया गया है कि अधिकारियों को अब पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकलकर तकनीक आधारित कार्यप्रणाली को अपनाना होगा। फाइलों के मूवमेंट को डिजिटल ट्रैक किया जाएगा, जिससे न केवल निर्णय लेने में पारदर्शिता आएगी बल्कि फाइलों के सालों-साल दबे रहने की संस्कृति पर भी रोक लगेगी। इस सुधार का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों से जुड़े मामलों पर पड़ेगा।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि जनता की समस्याओं का समाधान एक निश्चित समय-सीमा के भीतर होना चाहिए। शासन स्तर पर यह माना जा रहा है कि अगर अधिकारी बैठकों के बजाय फील्ड और फाइलों के त्वरित निपटारे पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन जमीन पर अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा और आम जनता को समय पर राहत मिल पाएगी।
 

 

 

     
 

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