अमेरिका का नया टैरिफ कानून: क्या भारत का 140 अरब डॉलर का व्यापार दांव पर? विस्तार से जानिए जमीनी हकीकत

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Sat, 19 Sep 2026 05:36 PM IST

अमेरिका के नए 'सैंक्सनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' से भारतीय निर्यातकों की चिंता क्यों बढ़ गई है? जानिए भारत-अमेरिका व्यापार, 100% टैरिफ के खतरे और ऊर्जा सुरक्षा पर इसके असर की पूरी कहानी। विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें।

New US Tariff Law: Is India's 140 Billion Dollar Bilateral Trade at Risk?

अमेरिका का टैरिफ वॉर, हम कितने तैयार? - फोटो : amarujala.com

विस्तार

अमेरिका की ओर से पारित नए व्यापारिक कानून ने भारतीय निर्यातकों और नीति निर्माताओं के बीच भारी अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित 'सैनक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' के तहत अमेरिका को रूसी तेल व गैस खरीदने वाले देशों से आयातित सामानों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार मिल गया है। ऐसे समय में जब अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, 100% टैरिफ का यह सीधा खतरा भारत के इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल, लेदर और फार्मा जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों के लिए एक बड़े संकट की घंटी बजा रहा है

अमेरिका का नया टैरिफ कानून क्या है और यह कब से लागू होगा?

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा 18 सितंबर को हस्ताक्षरित यह नया कानून वाशिंगटन को मॉस्को के शीर्ष ऊर्जा खरीदारों पर दंडात्मक शुल्क लगाने की शक्तियां देता है। यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर प्रभावी हो जाएगा।

कानून के तहत, लागू होने से ठीक पहले के 12 महीनों के दौरान रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस की कुल मात्रा के हिसाब से शीर्ष पांच खरीदार देशों में शामिल राष्ट्रों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक का आयात शुल्क थोपा जा सकता है। इस मानदंड के कारण भारत और चीन जैसे देश, जो रूसी ऊर्जा के शीर्ष खरीदारों में शामिल हैं, सीधे तौर पर इस कानून की जद में आ रहे हैं।

भारतीय निर्यातकों की अनिश्चितता और चिंता क्यों बढ़ गई है?

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6.5 प्रतिशत बढ़कर 140.76 अरब डॉलर (निर्यात 87.3 अरब डॉलर और आयात 53.45 अरब डॉलर) रहा था। वहीं चालू वित्त वर्ष (2026-27) में अप्रैल-अगस्त के दौरान अमेरिका को भारत का माल निर्यात 6.17 प्रतिशत बढ़कर 42.8 अरब डॉलर पहुंच चुका है।

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (एफआईईओ) के अध्यक्ष एससी रल्हन के अनुसार, यदि अमेरिका इतना भारी शुल्क लगाता है, तो अमेरिका को होने वाला भारतीय निर्यात पूरी तरह ठप हो सकता है, क्योंकि कोई भी आयातक इतनी ऊंची दर का टैरिफ वहन नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, लेदर और फुटवियर क्षेत्र के प्रमुख निर्यातक फरीदा ग्रुप के चेयरमैन रफीक अहमद का कहना है कि उनके कुल निर्यात का 65 प्रतिशत अमेरिका जाता है, और किसी भी ड्यूटी बढ़ोतरी से शिपमेंट बुरी तरह प्रभावित होंगे। वहीं टेक्नोक्राफ्ट इंडस्ट्रीज के सीएमडी शरद सराफ का मानना है कि टैरिफ दरों से भी ज्यादा व्यापारिक माहौल में उपजी यह अस्थिरता और अनिश्चितता निर्यातकों के नए ऑर्डर व निर्णय लेने की क्षमता को रोक रही है।

क्या यह भारत पर दबाव बनाने की कूटनीतिक रणनीति है?

थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून भारत पर दोतरफा दबाव बनाने की अमरीकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। शरद सराफ के अनुसार, यह कदम नवंबर में होने वाले अमरीकी मध्यावधि चुनावों से पहले भारत जैसे देशों पर दबाव बनाने का एक जरिया हो सकता है।

जीटीआरआई के विश्लेषण के मुताबिक, इस कानून का इस्तेमाल नई दिल्ली को रूसी तेल खरीद बंद करने और एक असमान द्विपक्षीय व्यापार समझौते को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के लिए किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस दबाव के बदले 6 फरवरी के संयुक्त बयान में पेश की गई 18 प्रतिशत की टैरिफ दर को बहाल करने की शर्त रख सकता है।

भारत के लिए आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

यद्यपि भारत और अमेरिका दोनों ही वर्ष 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रख रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति में भारत को सतर्क रुख अपनाना होगा। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का स्पष्ट कहना है कि भारत को अस्थायी टैरिफ राहत के बदले अपनी ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि न तो व्यापार समझौता करना और न ही रूसी तेल आयात बंद करना भारत को धारा 301 या अन्य अमेरिका व्यापार कानूनों से स्थायी सुरक्षा दे सकता है, क्योंकि अमेरिका ने यूरोपीय संघ (ईयू), जापान और दक्षिण कोरिया जैसे सहयोगियों के साथ द्विपक्षीय सौदे करने के बाद भी नए टैरिफ लगाए हैं। इसलिए भारत को अमेरिका टैरिफ धमकियों के दबाव में अपनी राष्ट्रीय ऊर्जा नीति तय करने से बचना चाहिए।

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