बालाघाट जिले में दूषित जल से 11 मासूमों की मौत, उच्चस्तरीय जांच की मांग

   Rajendra Parasar
       
 
 बालाघाट जिले में दूषित जल से 11 मासूमों की मौत, उच्चस्तरीय जांच की मांग ,पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
भोपाल। प्रदेश के बालाघाट जिले का आदिवासी बहुल बिरसा विकासखंड इस समय एक भीषण स्वास्थ्य संकट के दौर से गुजर रहा है। दूषित पेयजल और तेजी से फैलते संक्रमण की वजह से पिछले एक सप्ताह के भीतर 11 मासूम आदिवासी बच्चों की अकाल मौत हो चुकी है, जबकि 100 से अधिक बच्चे अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर गहरी चिंता व्यक्त की है और इसे प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बताया है। सिंह ने पत्र में आरोप लगाया कि जिला प्रशासन मौतों का आंकड़ा छिपाने की कोशिश कर रहा है। प्रशासन केवल 7 मौतों की पुष्टि कर रहा है, जबकि 4 अन्य बच्चों की जानकारी दबाई जा रही है। जिला अस्पताल का शिशु वार्ड पूरी तरह भर चुका है और लगभग 50 बच्चों की हालत अत्यंत गंभीर है। ग्राम बोंदारी के मजदूर समारू धुर्वे के दो मासूम बच्चों साहिल और नामिन की निमोनिया से हुई दुखद मृत्यु का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कई परिवार पूरी तरह तबाह हो गए हैं।
सिंह ने सरकार के दावों पर प्रहार करते हुए कहा कि एक ओर हर घर नल से जल योजना के नाम पर 30,000 करोड़ खर्च करने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के बच्चे दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि स्वास्थ्य मंत्री और प्रमुख सचिव विशेषज्ञों की टीम के साथ प्रभावित गांवों में तुरंत कैंप लगाएं, विभागीय लापरवाही की राज्य स्तरीय जांच कराई जाए, मृतक बच्चों के परिजनों को 10 लाख की आर्थिक सहायता दी जाए और गंभीर बच्चों को एयरलिफ्ट कर बड़े शहरों में निशुल्क इलाज मुहैया कराया जाए।
 छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र के बाद अब प्रदेश में एनालॉग पनीर पर लगेगी रोक
सेहत के लिए हानिकारक है वनस्पति तेल और केमिकल से बना यह पनीर
भोपाल। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के बाद अब मध्य प्रदेश में भी नकली और स्वास्थ्य के लिए घातक एनालॉग पनीर की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगने जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस पर रोक लगाने के कड़े निर्देश जारी कर दिए हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मुख्यमंत्री निवास पर संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि मध्यप्रदेश में एनालॉग पनीर पर प्रतिबंध लगाया जाएगा, जैसे अन्य राज्यों ने लगाया है। उन्होंने कहा कि हम प्राकृतिक रूप से दुग्ध उत्पादन को बढाएंगे और प्राकृतिक रूप से ही पनीर बनाएंगे। गौरतलब है कि अब तक प्रदेश भर में असली पनीर के नाम पर धड़ल्ले से एनालॉग पनीर बेचा जा रहा था, जिससे आम जनता के स्वास्थ्य पर गंभीर ख़तरा मंडरा रहा था। राज्य सरकार ने सेहत से जुड़े इन गंभीर जोखिमों को देखते हुए यह कड़ा रुख अपनाया है।
पदोन्नति में बाधक ना बने सीपीसीटी परीक्षा
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की पदोन्नति में सीपीसीटी परीक्षा बाधक नहीं बने। उन्होंने निर्देश दिए कि तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की पदोन्नति में सीपीसीटी परीक्षा को उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता पर जल्द सकारात्मक निर्णय लिया जाए। यह सुनिश्चित करें कि सभी तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पात्र कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ मिले।  सीपीसीटी परीक्षा के कारण कोई भी तृतीय-चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी पदोन्नति से वंचित या रिवर्ट नहीं हो।
सरकारी शिक्षकों को बड़ी राहत, अब सुबह 10.30 बजे तक लग सकेगी ई-अटेंडेंस
बारिश व समय विसंगति को देखते हुए नियमों में ढील’
भोपाल। स्कूल शिक्षा विभाग ने भारी बारिश, खराब मौसम और समय सारणी की विसंगतियों को ध्यान में रखते हुए ई-अटेंडेंस दर्ज कराने के कड़े नियमों में ढील दी है। लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) द्वारा शिक्षक संघों के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित समीक्षा बैठक के बाद अब सुबह 9.45 बजे तक हाजिरी लगाने की अनिवार्य शर्त को समाप्त कर दिया गया है। शिक्षक अब सुबह 10.30 बजे तक आसानी से अपनी ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करा सकेंगे।
यह निर्णय लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह और मध्य प्रदेश शिक्षक संघ के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई बैठक में लिया गया। आयुक्त द्वारा जारी आदेष के अनुसार विद्यालय का नियमित समय सुबह 10.30 से अपराह्न 4.30 बजे तक होने के कारण हाजिरी की समय सीमा 10.30 बजे तय की गई। अत्यंत खराब मौसम या आपात स्थिति में सुबह 10.45 बजे तक ई-अटेंडेंस स्वीकार करने के प्रावधान पर भी सहमति बनी है।
बुनियादी सुविधाओं की भी उठी मांग
बैठक के दौरान शासकीय शिक्षक संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष उपेंद्र कौशल ने डिजिटल नियमों के क्रियान्वयन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार को सुदूर और ग्रामीण अंचलों में तैनात शिक्षकों की व्यावहारिक समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने मांग की कि डिजिटल नियम लागू करने से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों के लिए आवास, सुरक्षित परिवहन और विशेष ग्रामीण भत्ते जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि वे विषम परिस्थितियों में भी बेहतर कार्य कर सकें।
  बिना डकैतों के जारी दस्यु कानून, चंबल के युवाओं का भविष्य दांव पर
2007 में खत्म हो चुके हैं सूचीबद्ध गिरोह, फिर भी 6 जिलों में दर्ज हुईं 1000 से अधिक एफआईआर
भोपाल। मध्यप्रदेश में दस्यु समस्या पूरी तरह समाप्त होने के बावजूद चार दशक पुराना मध्यप्रदेष डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम 1981 (एमपीडीएवी एक्ट) निरस्त न होने से विवाद गहरा गया है। ग्वालियर, चंबल और रीवा संभाग के बीहड़ों में कभी सक्रिय आपराधिक गिरोहों पर अंकुश लगाने के लिए बने इस कानून का इस्तेमाल अब आम नागरिकों और युवाओं के खिलाफ किए जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
पूर्व नेता प्रतिपक्ष डा गोविंद सिंह ने इसे लेकर मुख्यमंत्री डा मोहन यादव को पत्र लिखा है। उन्होंने उल्लेख किया है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में अंतिम सूचीबद्ध डकैत गिरोह वर्ष 2007 में ही खत्म कर दिया गया था। इसके बावजूद, अकेले चंबल अंचल के 6 जिलों में वर्ष 2020 से अब तक इस सख्त कानून के तहत 1,000 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी हैं। उन्होंने इसे कानून का घोर दुरुपयोग और संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) व अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन मान रहे हैं।
कानून की आड़ में अधिकारों पर कुठाराघात
डा सिंह ने बताया कि अधिनियम की धारा 5 के तहत आरोपी को अग्रिम जमानत मिलने का कोई प्रावधान नहीं है, जिससे आम लोगों के मौलिक अधिकार सीमित हो रहे हैं। धारा 6 के तहत गठित विशेष न्यायालय की कार्यप्रणाली पर भी प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को प्रभावित करने के आरोप लग रहे हैं। साधारण अपराधों में भी भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ इस दस्यु विरोधी कानून की धारा 11 और 13 जोड़कर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं, जिससे युवाओं का करियर प्रभावित हो रहा है।
सदन में आश्वासन, निरसन का इंतजार
उल्लेखनीय है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सार्वजनिक रूप से देश-प्रदेश से दस्यु समस्या समाप्त होने का दावा कर चुके हैं। यही नहीं, वर्ष 2012 के बजट सत्र में राज्य के तत्कालीन गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने भी विधानसभा में इस अधिनियम को निरस्त करने का आश्वासन दिया था। वर्ष 2007 से ही विधानसभा में प्रश्नों, ध्यानाकर्षण सूचनाओं और बजट भाषणों के माध्यम से इस जनविरोधी हो चुके कानून को समाप्त करने की लगातार मांग उठाई जा रही है। डा सिंह ने जनहित को ध्यान में रखते हुए अब सरकार से इस असंगत अधिनियम को तत्काल निरस्त करने की अपील की गई है।
 प्रदेश में सिकल सेल का खतरा, 1.33 करोड़ की जांच में मिले 40 हजार मरीज
देश के 60 फीसदी मरीज केवल ओडिशा और मध्य प्रदेश में
भोपाल।  राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (एनएससीएमईएम) के तहत मध्य प्रदेश में चलाए जा रहे जांच अभियान के आंकड़े चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। प्रदेश में अब तक 1.33 करोड़ से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है, जो देश में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। हालांकि, जांच के बाद सामने आए आंकड़ों ने स्वास्थ्य विभाग की नींद उड़ा दी है। राज्य में यह बीमारी तेजी से बढ़ती जा रही हैं
राज्यसभा में स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत 4 अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में अब तक कुल 1,33,69,993 लोगों की जांच की जा चुकी है। इनमें से 40,741 लोग सिकल सेल बीमारी से पीड़ित पाए गए हैं, जबकि 2,45,024 लोग सिकल सेल के वाहक (कैरियर) चिह्नित हुए हैं। आंकड़ों का सबसे डरावना पहलू यह है कि देशभर में चिह्नित सिकल सेल मरीजों का लगभग 60 प्रतिशत (59.28 प्रतिशत ) हिस्सा अकेले ओडिशा और मध्य प्रदेश में केंद्रित है। मरीजों की कुल संख्या के मामले में ओडिशा 1,06,969 मरीजों के साथ देश में पहले स्थान पर है, जबकि मध्य प्रदेश 40,741 मरीजों के साथ दूसरे नंबर पर बना हुआ है।
मुफ्त जांच और डिजिटल ट्रैकिंग
हालात को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष रूप से जनजातीय बहुल जिलों में अभियान को तेज कर दिया हैं आयुष्मान आरोग्य मंदिर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और जिला अस्पतालों में 0 से 40 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों की मुफ्त जांच की जा रही है। मरीजों को बीमारी के प्रभाव को कम करने के लिए हाइड्रोक्सीयूरिया और फॉलिक एसिड की दवाएं मुफ्त बांटी जा रही हैं। सभी मरीजों और वाहकों की डिजिटल ट्रैकिंग की जा रही है ताकि उन्हें समय पर उचित इलाज और परामर्श मिल सके।
वाहक और मरीज में अंतर
सिकल सेल वाहक वे होते हैं जिसे माता-पिता में से केवल एक से दोषपूर्ण जीन मिलता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं बीमार नहीं होते और न ही उनमें लक्षण दिखते हैं, लेकिन वे इस जीन को अपनी अगली पीढ़ी में स्थानांतरित कर सकते हैं। वहीं सिकल सेल मरीज वे होते हैं जिसे माता-पिता दोनों से दोषपूर्ण जीन प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्तियों में भयंकर शारीरिक दर्द, गंभीर एनीमिया (खून की कमी) और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचने जैसी गंभीर समस्याएं होती हैं।
विवाह से पहले स्क्रीनिंग जरूरी
चिकित्सकों का कहना है कि सिकल सेल जैसी वंशानुगत बीमारी से बचने का सबसे कारगर तरीका विवाह से पहले स्क्रीनिंग कराना है। यदि दो वाहक आपस में शादी न करें और समय पर इलाज लिया जाए, तो इस बीमारी के फैलाव पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है।
  मांगों को लेकर बिल्डिंग पर चढ़े 3 छात्र, रिजल्ट जारी करने की मांग
भोपाल। नर्सिंग छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है। नर्सिंग स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (एनएसओ) ने अपनी 7 सूत्रीय मांगों को लेकर 8 अगस्त से नर्सिंग काउंसिल के सामने अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया है। बुधवार को प्रदर्शन के दौरान तीन छात्र पास की एक खाली बिल्डिंग पर चढ़ गए। छात्रों की मांग थी कि लंबित रिजल्ट जल्द जारी किए जाएं। पुलिस की समझाइश के बाद तीनों छात्र कुछ देर बाद सुरक्षित नीचे उतर आए।
छात्रों की प्रमुख मांगों में जीएनएस और बीएससी नर्सिंग के रिजल्ट जारी करना, आगामी परीक्षाएं कराना और एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग के नर्सिंग एवं पैरामेडिकल छात्रों को स्कॉलरशिप देना शामिल है। छात्र ईडब्ल्यू वर्ग के लिए भी स्कॉलरशिप योजना शुरू करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा नर्सिंग और पैरामेडिकल कॉलेजों को क्षेत्रीय यूनिवर्सिटीज से हटाकर दोबारा मेडिकल यूनिवर्सिटी जबलपुर से जोड़ने और नर्सिंग शिक्षा में भ्रष्टाचार खत्म करने की मांग उठाई गई है। छात्रों ने अपनी मांगें पूरी नहीं होने पर भूख हड़ताल का भी ऐलान किया है। छात्रों का कहना है कि लंबे समय से रिजल्ट और परीक्षाओं में देरी के कारण उनके भविष्य पर असर पड़ रहा है। अब देखना होगा कि सरकार और नर्सिंग काउंसिल छात्रों की मांगों पर क्या कदम उठाती है।
 घोषणाओं और मंचों से आगे बढ़कर किसानों को वास्तविक लाभ दे सरकार
आय, लागत, एमएसपी और फसल बीमा पर स्थिति स्पष्ट करे राज्य सरकार’
भोपाल। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार द्वारा मनाए जा रहे ‘कृषक कल्याण वर्ष’ को केवल आयोजनों और प्रचार तक सीमित रहने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार को मंच, महोत्सव और घोषणाओं से आगे बढ़कर किसान की वास्तविक आय, लागत, फसल के दाम, कर्ज और फसल बीमा पर पारदर्शी जवाब देना चाहिए।
जीतू पटवारी ने राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) और संसद के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि मध्यप्रदेश के 48.4 प्रतिशत कृषि परिवार कर्जदार थे, जिन पर औसत बकाया ऋण 74,420 रुपये था। एनएसओ 2018-19 के अनुसार प्रदेश के कृषि परिवार की औसत मासिक आय मात्र 8,339 रुपये थी, जो राष्ट्रीय औसत (10,218 रुपये) से काफी कम थी। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से सीधे सवाल किया कि यदि सरकार का दावा है कि किसानों की आय बढ़ी है, तो नए आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।
फसल सुरक्षा की मांग
पटवारी ने कहा कि किसान को केवल एमएसपी की घोषणा नहीं, बल्कि उसकी गारंटी चाहिए। मंडियों में गुणवत्ता और नमी के नाम पर कटौती बंद हो तथा निर्धारित मूल्य से कम पर खरीद की स्थिति में सरकार ठोस संरक्षण दे। बीज, खाद, डीजल, बिजली और सिंचाई की बढ़ती लागत के बीच जब तक लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक केवल उत्पादन बढ़ने का दावा किसानों की किस्मत नहीं बदल सकता।
’एनसीआरबी के आंकड़ों पर चिंता
फसल बीमा और प्राकृतिक आपदा पर बोलते हुए पटवारी ने कहा कि बीमा दावों का समय पर और वास्तविक नुकसान के अनुसार भुगतान जिला व फसलवार सार्वजनिक हो। उन्होंने एनसीआरबी 2024 के आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि प्रदेश में कृषि क्षेत्र से जुड़े 835 लोगों द्वारा आत्महत्या का मामला अत्यंत गंभीर है, जो देश में तीसरे स्थान पर है। पटवारी ने स्पष्ट कहा कि किसान को मंच नहीं, मुनाफा चाहिए; घोषणा नहीं, आय की गारंटी चाहिए, भाषण नहीं, मजबूत बाजार चाहिए।

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