अमेरिका और भारत की ट्रेड डील में कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर क्या है विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो दिन पहले भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर सहमति बनने और साथ ही भारत पर अमेरिकी टैरिफ़ को कम करते हुए 18 प्रतिशत करने की जानकारी दी.

हालांकि ट्रेड डील की विस्तृत जानकारी आना अभी बाकी है लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री समेत भारत सरकार के कई मंत्रियों ने इसे एक 'बड़ी उपलब्धि' बताया है.

लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने दावा किया था कि इस ट्रेड डील में किसानों और डेयरी सेक्टर के हितों को नज़रअंदाज़ किया गया है.

इसका जवाब देते हुए भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत ने अपने एग्रीकल्चर और डेयरी सेक्टरों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया है.

पीयूष गोयल ने कहा कि ट्रेड डील पर अंतिम दौर की बातचीत में ब्योरे तय किए जा रहे हैं और बहुत जल्द भारत और अमेरिका की ओर से इस पर एक संयुक्त बयान जारी किया जाएगा.

अमेरिकी कृषि मंत्री के बयान ने बढ़ाई चिंता

हालांकि ट्रंप और अमेरिकी कृषि मंत्री के बयानों ने भारत में चिंता बढ़ा दी है.

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर जो जानकारी दी उसमें कहा कि 'भारत अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ़ और नॉन टैरिफ़ बैरियर्स को ज़ीरो करेगा... प्रधानमंत्री ने अमेरिका से अधिक ख़रीद पर सहमति जताई है जिसमें 500 अरब डॉलर से अधिक की अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि, कोयला और अन्य कई उत्पादों की ख़रीद शामिल है.'

इसके बाद अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने भी इस डील को अमेरिकी किसानों के लिए लाभदायक बताते हुए कहा कि 'अमेरिकी कृषि उत्पादों के भारत के विशाल बाज़ार तक पहुंच' बढ़ने और इससे '1.3 अरब डॉलर के भारत के साथ अमेरिकी कृषि व्यापार घाटे को कम करने में मदद' मिलेगी.

माना जा रहा है कि भारत की ओर से कुछ आपत्तियों की वजह से अमेरिका के साथ ट्रेड डील में इतनी देर हुई है.

इस बारे में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बीते अक्तूबर में कहा था कि भारत के 'बॉटम लाइन्स' और 'रेड लाइन्स' का सम्मान किया जाना चाहिए.

दरअसल भारत की कुछ चिंताएं रही हैं जिनकी वजह से यह ट्रेड डील इतने लंबे समय तक खिंची.

भारत की इन चिंताओं पर आइए डालते हैं एक नज़र.

1. एग्रीकल्चर सेक्टर

भारतीय कृषि क्षेत्र

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images इमेज कैप्शन, अमेरिका लगातार दबाव बनाता रहा है कि भारत अपने कृषि क्षेत्र को खोले  

2. डेयरी सेक्टर का मुद्दा

डेयरी सेक्टर

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इमेज कैप्शन, डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाज़ार खोलने को लेकर नुक़सान की आशंका ज़ाहिर की जा रही है

पिछले साल जुलाई में बीबीसी में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़, डेयरी सेक्टर भी भारत अमेरिका ट्रेड डील में एक बड़ा मुद्दा रहा है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भारत के डेयरी सेक्टर का अहम योगदान माना जाता है.

भारत सरकार के प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो के मुताबिक़, साल 2023-24 में देश में 23.92 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ था. कुल दूध उत्पादन में दुनिया में भारत का पहला स्थान है.

भारत ने 2023-24 में 27.26 करोड़ डॉलर के 63,738 टन दुग्ध उत्पाद का निर्यात किया था. सबसे अधिक निर्यात यूएई, सऊदी अरब, अमेरिका, भूटान और सिंगापुर को होता है.

डेयरी उत्पादों के आयात पर भारत में अच्छा ख़ासा टैरिफ़ है. भारत में चीज़ (एक प्रकार का पनीर) पर 30 प्रतिशत, मक्खन पर 40 प्रतिशत और मिल्क पाउडर पर 60 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया जाता है.

यही वजह है कि न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से ये उत्पाद आयात करना लाभकारी नहीं है, जबकि इन देशों के डेयरी उत्पाद सस्ते हैं.

अगर भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए अपने बाज़ार खोलने का निर्णय लेता है तो उसे भारी नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

भारतीय स्टेट बैंक की हाल में ही आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़, अगर अमेरिकी डेयरी उत्पादों को इजाज़त दी जाती है तो इससे भारतीय दुग्ध उत्पाद के दाम कम से कम 15% गिर जाएंगे और इससे किसानों को हर साल 1.03 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो सकता है.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि डेयरी उत्पाद खोलने की वजह से भारत दुग्ध उत्पादक देश से दुग्ध उपभोक्ता देश बन सकता है.

अमेरिका लगातार दबाव बनाता रहा है कि भारत अपने कृषि क्षेत्र को खोले

पिछले साल अप्रैल में प्रकाशित बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में खेती से देश की आधी आबादी यानी करीब 70 करोड़ लोगों का भरण-पोषण हो रहा है और यह सेक्टर भारत की रीढ़ बना हुआ है.

खेती भारत के क़रीब आधे कामगारों को रोज़गार देती है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इसका केवल 15 फीसदी योगदान है.

अमेरिका कई सालों से भारत पर कृषि क्षेत्र को व्यापार के लिए खोलने के लिए दबाव बना रहा है.

वो भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में देखता है लेकिन भारत खाद्य सुरक्षा, आजीविका और लाखों किसानों के हित का हवाला देकर इससे बचता रहा है.

और बातचीत में सबसे बड़ा मुद्दा कृषि उत्पादों का निर्यात रहा है. भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार आठ अरब डॉलर का है, जिसमें भारत चावल, झींगा और मसाले निर्यात करता है और अमेरिका मेवे, सेब और दालें भेजता है.

अमेरिका भारत के साथ अपने 45 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने के लिए मक्का, सोयाबीन और कपास के बड़े कृषि निर्यात के लिए दरवाज़े खोले जाने की मांग करता रहा है.

विशेषज्ञों को डर है कि टैरिफ़ में रियायतें भारत को अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी और सार्वजनिक ख़रीद को कम करने के लिए दबाव डाल सकती हैं.

ये दोनों भारतीय किसानों के प्रमुख कवच हैं, जो उन्हें अपनी फसलों के उचित दाम की गारंटी देकर उन्हें क़ीमतों में अचानक कमी से बचाते हैं और अनाज ख़रीद को सुनिश्चित करते हैं.

पिछले साल जुलाई में बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास से ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अजय श्रीवास्तव ने कहा था, "डेयरी उत्पादों या चावल और गेहूं जैसे प्रमुख खाद्यान्नों पर टैरिफ़ में कोई कटौती की उम्मीद नहीं है क्योंकि इन पर कृषि आधारित आजीविका दांव पर लगी हुई है."

"ये श्रेणियां राजनीतिक और आर्थिक रूप से संवेदनशील हैं क्योंकि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 70 करोड़ से अधिक लोग इससे प्रभावित होते हैं."

दिलचस्प बात है कि नीति आयोग के एक ताज़ा दस्तावेज़ में प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत चावल, डेयरी, पोल्ट्री, मक्का, सेब, बादाम और जीएम सोया सहित अमेरिकी कृषि आयात पर टैरिफ़ कटौती की सिफ़ारिश की गई है.

3. 'नॉन-वेज मिल्क' को लेकर चिंता

दूध

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इमेज कैप्शन, भारत अमेरिका के बीच ट्रेड डील में 'नॉन-वेज मिल्क' भी एक मुद्दा रहा है

डेयरी सेक्टर से जुड़ा एक और मुद्दा 'नॉन-वेज मिल्क' है. जुलाई 2025 में प्रकाशित बीबीसी की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत सरकार ने इसे लेकर सांस्कृतिक चिंताओं का हवाला देते हुए अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आयात की इजाज़त देने से इनकार कर दिया था.

भारत में एक बड़ी आबादी शाकाहारी है और जानवारों के मांस से जुड़ा चारा खाने वाली गायों के दूध को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं मानती है.

ऐसी गायों के दूध को नॉन-वेज मिल्क कहा जाता है.

अमेरिकी डेयरी उद्योगों में गायों को वज़न बढ़ाने के लिए ऐसा चारा दिया जाता है जिनमें जानवरों का मांस या ख़ून मिला होता है. इसी वजह से इसे 'ब्लड मील' भी कहा जाता है.

सिएटल टाइम्स के एक लेख के मुताबिक़, "गायों को ऐसा चारा दिया जाता है जिसमें सुअर, मछली, चिकन, घोड़े और यहां तक कि बिल्लियों या कुत्ते का मांस होता है. और मवेशियों को प्रोटीन के लिए सुअर और घोड़े का ख़ून दिया जाता है. जबकि मोटे होने के लिए इन जानवरों के फ़ैट का हिस्सा भी शामिल होता है."

बीबीसी न्यूज़ हिंदी में छपी एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़, 'ब्लड मील' मीट पैकिंग व्यवसाय का बाई-प्रोडक्ट होता है और इसे दूसरे जानवरों को खिलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

जानवरों को मारने के बाद उनके ख़ून को जमाकर उसे सुखाकर एक ख़ास तरह का चारा बनाया जाता है- इसे 'ब्लड मील' कहा जाता है.

4. रूस से तेल की ख़रीद

तेल उद्योग

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 ट्रंप ने रूसी तेल ख़रीदने को लेकर भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ़ लगाया था

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ़ के अलावा अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ़ रूसी तेल ख़रीदने के लिए दंडात्मक रूप से लगाया था.

ट्रंप बार-बार भारत से रूसी तेल ख़रीद बंद करने और अमेरिका से अधिक से अधिक डिफ़ेंस ख़रीद करने की मांग करते रहे हैं.

टैरिफ़ कटौती की घोषणा करते हुए बीते मंगलवार को ट्रंप ने ये भी कहा कि भारत ने रूस से तेल ख़रीद को पूरी तरह बंद करने पर सहमति जताई है और इसकी जगह वो अमेरिका से वेनेज़ुएला का तेल ख़रीदेगा.

पहले भी ट्रंप ऐसे दावे करते रहे हैं लेकिन भारत सरकार की ओर से कभी इस पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई. हालांकि रूसी तेल की ख़रीद में लगातार गिरावट दर्ज होती गई है.

लेकिन पिछले महीने के अंत में भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा था कि रूस से होने वाली आपूर्ति पहले ही घटकर 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई है, जो पिछले साल के औसत 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन से कम है. पुरी ने कहा था कि इसमें गिरावट का रुझान है और ये बाज़ार-आधारित परिस्थितियां हैं.

अमेरिका भारत को रूस से अपने संबंध कम करने का भी दबाव डालता रहा है, तेल ख़रीद उनमें से एक है और भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को छोड़ना नहीं चाहता.

बीते नवंबर में ही भारत ने अपने एलपीजी आयात का 10 फ़ीसदी हिस्सा अमेरिका से ख़रीदने का समझौता किया था.

बीते दिसंबर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत का दौरा किया था और उन्होंने 'भारत पर अमेरिकी दबाव की आलोचना' की थी.

5. डिफ़ेंस ख़रीद

एफ़-35

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इमेज कैप्शन, ट्रंप पहले ही भारत को एफ़-35 लड़ाकू विमान देने की पेशकश कर चुके हैं

इस डील पर नज़र रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका भारत पर तेल और एलएनजी के अलावा बोइंग विमान, हेलिकॉप्टर और परमाणु रिएक्टर तक बड़े पैमाने पर कमर्शियल ख़रीद के लिए दबाव डाल सकता है.

ट्रंप ने कहा भी है कि भारत 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदेगा. जानकारों का अनुमान है कि इनमें एक बड़ा हिस्सा डिफ़ेंस सेक्टर का हो सकता है.

ऊर्जा के अलावा भारत और रूस के संबंधों में रक्षा साझेदारी काफ़ी अहम है लेकिन यहाँ भी रूस की भूमिका लगातार कम हो रही है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक़, 2020 से 2024 के बीच भारत ने अपने सैन्य उपकरणों का 36% रूस से आयात किया था. जबकि 2006-10 की अवधि में भारत के 82% सैन्य उपकरण रूस से आयात किए गए थे.

ट्रंप के दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद जब पिछले साल फ़रवरी में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे मिलने वॉशिंगटन गए थे तब ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका भारत को एफ़-35 फ़ाइटर जेट देने के लिए तैयार है.

मार्च 2025 में बीबीसी पर प्रकाशित सौतिक बिस्वास की रिपोर्ट के मुताबिक़, एफ़-35 की कीमत लगभग 8 करोड़ डॉलर (करीब 670 करोड़ रुपये) प्रति यूनिट है, जो इसे सबसे महंगे जेट्स में से एक बनाती है.

भारत के सामने एक सवाल ये है कि या अमेरिका से आधुनिक लेकिन बेहद महंगा एफ़-35 खरीदे या फिर रूस के साथ रक्षा सहयोग को मज़बूत करते हुए उसके सबसे आधुनिक स्टेल्थ फ़ाइटर जेट, सुखोई एसयू-57 का प्रोडक्शन अपने यहां करे.

भारत के सामने एफ़-35 को लेकर काफ़ी चुनौतियां हैं. इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा है, इसकी देखभाल करना भी काफ़ी महंगा है और इसके संचालन में कई दिक़्क़तें हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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इस डील पर नज़र रखने वाले एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका भारत पर तेल और एलएनजी के अलावा बोइंग विमान, हेलिकॉप्टर और परमाणु रिएक्टर तक बड़े पैमाने पर कमर्शियल ख़रीद के लिए दबाव डाल सकता है.

ट्रंप ने कहा भी है कि भारत 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद ख़रीदेगा. जानकारों का अनुमान है कि इनमें एक बड़ा हिस्सा डिफ़ेंस सेक्टर का हो सकता है.

ऊर्जा के अलावा भारत और रूस के संबंधों में रक्षा साझेदारी काफ़ी अहम है लेकिन यहाँ भी रूस की भूमिका लगातार कम हो रही है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक़, 2020 से 2024 के बीच भारत ने अपने सैन्य उपकरणों का 36% रूस से आयात किया था. जबकि 2006-10 की अवधि में भारत के 82% सैन्य उपकरण रूस से आयात किए गए थे.

ट्रंप के दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद जब पिछले साल फ़रवरी में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे मिलने वॉशिंगटन गए थे तब ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका भारत को एफ़-35 फ़ाइटर जेट देने के लिए तैयार है.

मार्च 2025 में बीबीसी पर प्रकाशित सौतिक बिस्वास की रिपोर्ट के मुताबिक़, एफ़-35 की कीमत लगभग 8 करोड़ डॉलर (करीब 670 करोड़ रुपये) प्रति यूनिट है, जो इसे सबसे महंगे जेट्स में से एक बनाती है.

भारत के सामने एक सवाल ये है कि या अमेरिका से आधुनिक लेकिन बेहद महंगा एफ़-35 खरीदे या फिर रूस के साथ रक्षा सहयोग को मज़बूत करते हुए उसके सबसे आधुनिक स्टेल्थ फ़ाइटर जेट, सुखोई एसयू-57 का प्रोडक्शन अपने यहां करे.

भारत के सामने एफ़-35 को लेकर काफ़ी चुनौतियां हैं. इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा है, इसकी देखभाल करना भी काफ़ी महंगा है और इसके संचालन में कई दिक़्क़तें हैं.

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