भारत और अमेरिका के बीच सोमवार को जिस ट्रेड डील की घोषणा डोनाल्ड ट्रंप ने की उसे लेकर बहस हो रही है कि यह किसके पक्ष में ज़्यादा झुकी हुई है.
ट्रंप ने भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया था, जिसे अब घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका स्वागत किया है. 50 प्रतिशत की तुलना में 18 प्रतिशत टैरिफ़ भले कम लग रहा है लेकिन कई विश्लेषक ट्रंप के पहले वाले टैरिफ़ का हवाला देते हुए 18 प्रतिशत को भी बहुत ज़्यादा बता रहे हैं.
2012 से 2014 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कम्युनिकेशन एडवाइजर रहे पंकज पचौरी ने एक्स पर लिखा है, ''अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान 2004 तक भारत पर औसत अमेरिकी टैरिफ़ 3.31% थे.''
''यही टैरिफ़ उस समय भी लागू था, जब भारत के परमाणु कार्यक्रम के बाद प्रतिबंध लगाए गए थे. 2014 तक मनमोहन सिंह के अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद औसत टैरिफ़ घटकर 2.93% रह गए. अब हम 18% टैरिफ़ का जश्न मना रहे हैं.''
ट्रंप प्रशासन इस ट्रेड डील को अपनी जीत बता रहा है. व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने इस डील को अमेरिकी कारोबारियों, कामगारों और उपभोक्ताओं की जीत बताया है.
इमेज कैप्शन, 18 प्रतिशत टैरिफ़ होने से भारत की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री को फ़ायदा होगा
ट्रंप ने इस ट्रेड डील की घोषणा करते हुए ट्रुथ सोशल पर लिखा था कि भारत 18 प्रतिशत टैरिफ़ के बदले में रूस से तेल आयात बंद करेगा, अमेरिकी सामान पर भारत के बाज़ार में ज़ीरो टैरिफ़ होगा और भारत 500 अरब डॉलर का अमेरिकी उत्पाद ख़रीदेगा. कहा जा रहा है कि अगर भारत वाक़ई ट्रंप की इन घोषणाओं के साथ है तो यह डील मोदी सरकार के लिए आसान नहीं है.
एबरडीन इन्वेस्टमेंट्स में एशियाई इक्विटीज़ के वरिष्ठ निवेश निदेशक जेम्स थॉम ने सीएनबीसी से कहा, ''इस डील के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारत के श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्र कपड़ा, चमड़ा, आभूषण, खिलौने और फर्नीचर को बढ़त मिलेगी. 18% टैरिफ़ दर से छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों को लाभ मिलने की संभावना है क्योंकि यह दर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान की 19% से कम है जबकि वियतनाम और बांग्लादेश पर 20% टैरिफ लागू हैं.''
अमेरिका के प्रमुख अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि दोनों देशों के बीच डील की घोषणा तो हो गई है लेकिन कई ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब आने बाक़ी हैं.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''ट्रंप ने लिखा कि नई दर तुरंत प्रभावी होगी लेकिन इसके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं दी गई. कई अहम शर्तें साफ़ नहीं हैं. ट्रंप का यह दावा भी शामिल है कि भारत ने अमेरिका में 500 अरब डॉलर खर्च करने पर सहमति जताई है. लेकिन इसका भारतीय पक्ष ने तत्काल कोई उल्लेख नहीं किया.''
यूएस इंटरनेशनल डेवलपमेंट फ़ाइनैंस कॉर्पोरेशन में काम चुकीं निशा बिस्वाल ने एनवाईटी से कहा, "यह अमेरिका–भारत संबंधों में एक बड़ी अड़चन को दूर करता है और संभवतः ज़्यादा सहयोग का रास्ता खोलता है.'etty Images
एनवाईटी ने लिखा है, ''यह समझौता रूस में स्वागत योग्य ख़बर नहीं था. क्रेमलिन ने मंगलवार को कहा कि उसे भारत की ओर से रूसी तेल की ख़रीद बंद किए जाने के बारे में कोई सूचना नहीं मिली है लेकिन स्थिति पर नज़र है.''
''भारत अगर रूस से तेल आयात बंद करता है तो ऊर्जा से रूस को होने वाली आय पर असर पड़ सकता है, जो पिछले साल पहले ही काफ़ी घट चुकी थी. रूस के उप प्रधानमंत्री अलेक्ज़ेंडर नोवाक ने मंगलवार को रूसी मीडिया से कहा कि रूस की तेल आपूर्ति की मांग बाज़ार में हमेशा बनी रहेगी.''
एनवाईटी ने लिखा है कि ट्रंप के दावों को पूरा करना भारत के लिए आसान नहीं होगा.
अमेरिकी अख़बार ने लिखा है, ''मिसाल के तौर पर अमेरिका की गायें शाकाहारी नहीं हैं. भारतीय उपभोक्ता इसे स्वीकार नहीं करेंगे कि डेयरी उत्पाद ग़ैर-शाकाहारी गाय के हों. इसके अलावा यह उन सात करोड़ भारतीयों की आजीविका पर भी असर डालेगा जो डेयरी उत्पादन पर निर्भर हैं. इसी तरह की सीमाओं के कारण अधिकांश अमेरिकी कृषि उत्पादों का प्रवेश भी सीमित रहने की उम्मीद है.''
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने लिखा है कि इस डील से भारत की मुश्किलें ख़त्म नहीं हुई हैं.
ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''मोदी के लिए कृषि से जुड़ी रियायतें अक्सर समस्या साबित हुई हैं और भारत का कृषि क्षेत्र काफ़ी हद तक संरक्षित है. किसी भी पक्ष ने यह नहीं कहा है कि क्या भारत इन बाधाओं को कम करेगा. लेकिन एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कई प्रमुख फसलों में जिनमें गेहूं भी शामिल है, काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर है और दुनिया की सबसे बड़ी चावल निर्यातक है.''
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''भारत आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों पर भी सख्त प्रतिबंध बनाए रखता है जबकि अमेरिका में मक्का और सोयाबीन का अधिकांश उत्पादन ऐसी ही फसलों पर आधारित है. बातचीत के दौरान वॉशिंगटन ने आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के लिए अधिक पहुंच के साथ-साथ अपने डेयरी उत्पादों के प्रवेश पर भी ज़ोर दिया लेकिन भारत शायद ही इसे स्वीकार करे.''
भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से निर्यात-आधारित नहीं है लेकिन अमेरिका भारत का सबसे बड़ा बाज़ार है. भारत के कुल विदेशी निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा अमेरिका में जाता है.
वॉशिंगटन स्थित एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ उपाध्यक्ष वेंडी कटलर ने ब्लूमबर्ग से कहा, "इस डील के डिटेल की कमी के कारण यह आकलन करना मुश्किल है कि किसे बेहतर सौदा मिला लेकिन हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जहां कुछ प्राथमिकताएं साझा थीं, वहीं दोनों पक्षों के अपने-अपने अलग मक़सद भी थे. जैसे कि अमेरिका की ओर से भारतीय बाज़ार में अमेरिकी सामानों और कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर ख़रीद की मांग."
'वी पे द टैरिफ्स' नामक टैरिफ-विरोधी समूह के कार्यकारी निदेशक डैन एंथनी ने ब्लूमबर्ग से कहा कि भारतीय आयात पर अमेरिकी टैरिफ़ में कटौती के बावजूद यह बहुत कम नहीं हुआ है
उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है, "राष्ट्रपति ट्रंप की टैरिफ़ नीतियों से पहले अमेरिकी आयातक भारत से आने वाले सामान पर औसतन लगभग 2.5% टैरिफ़ देते थे. भारत एक साल पहले जो भुगतान कर रहा था, उससे अब भी छह गुना ज़्यादा टैरिफ़ देगा. यह राहत नहीं है, बल्कि एक स्थायी टैरिफ़ वृद्धि है. यह लंबे समय तक लागू रहेगी अगर कांग्रेस ने इसका विरोध नहीं किया."
अमेरिकी न्यूज़ नेटवर्क सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''ट्रंप ने कहा है कि भारत रूसी तेल के बदले अमेरिका और वेनेज़ुएला से तेल ख़रीदेगा. टॉर्टॉइज़ कैपिटल के वरिष्ठ पोर्टफोलियो प्रबंधक रॉब थम्मेल कहते हैं कि वेनेजुएला के तेल की गुणवत्ता रूसी तेल जैसी ही है. इन्हें भारत की रिफाइनरियां पहले से ही रिफाइन करने के लिए तैयार हैं.''
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक़ रूसी तेल की जगह वेनेज़ुएला का तेल रातोंरात नहीं ले लेगा क्योंकि वहाँ का एनर्जी इन्फ़्रास्ट्रक्चर अभी इस हालत में नह स्रोत, Getty
इमेज कैप्शन, ट्रंप से पहले भारत लगभग तीन प्रतिशत ही अमेरिका में टैरिफ़ दे रहा था
सीएनएन ने लिखा है, ''वेनेजुएला का तेल तंत्र जर्जर है. 1999 में देश की समाजवादी सरकार के सत्ता में आने से पहले हासिल किए गए रोजाना 30 लाख बैरल से अधिक उत्पादन के स्तर पर लौटने के लिए लगभग एक दशक का काम और अरबों डॉलर के निवेश की ज़रूरत होगी.''
सीएनएन से यूएस बैंक एसेट मैनेजमेंट के वरिष्ठ निवेश रणनीति निदेशक रॉब हॉवर्थ ने कहा, "वेनेजुएला या अमेरिका के तेल से रूसी तेल को पूरी तरह बदलने के लिए बड़े निवेश की ज़रूरत होगी. लेकिन समय के साथ, इससे रूसी अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त चुनौतियां पैदा हो सकती हैं."
सीएनएन ने लिखा है, ''भारत रूसी तेल का एक बड़ा ख़रीदार है. चीन भारत से कहीं अधिक रूसी तेल ख़रीदता है लेकिन चीन को रूसी तेल ख़रीदने के लिए अतिरिक्त टैरिफ़ का सामना नहीं करना पड़ा है. तुर्की तीसरे स्थान पर है, लेकिन काफ़ी पीछे. भारतीय सरकारी अधिकारियों ने पहले रूसी तेल की ख़रीद का बचाव करते हुए इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज़रूरी बताया है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और रूस एक नज़दीकी आपूर्तिकर्ता है.''
सीएनएन ने लिखा है, ''रूसी तेल ओपेक या अमेरिकी कच्चे तेल की तुलना में लगभग 16 डॉलर प्रति बैरल की बड़ी छूट पर कारोबार करता रहा है, जिससे भारत के लिए इसे छोड़ना मुश्किल हो जाता है. अमेरिका के साथ इस समझौते के बाद भी भारत प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए रूसी तेल ख़रीदता रह सकता है जैसा कि उसने पिछले कई वर्षों में किया
भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ फेलो अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा, "जब तेल की क़ीमतें ऊंची थीं, तब भारत को बड़ा लाभ हो रहा था. लेकिन अब जब तेल की क़ीमतें नीचे आ रही हैं तो वह फ़ायदा उतना बड़ा नहीं रह गया है. अगर इस गणना में यह भी जोड़ दें कि ट्रंप के टैरिफ से भारतीय निर्यातक नुक़सान उठा रहे थे, तो रूसी तेल ख़रीदना बंद करना आसान हो गया."
सीएनएन से कैटो इंस्टीट्यूट के अर्थशास्त्री स्कॉट लिंसिकॉम ने कहा, "भारत पिछले कई महीनों से इन व्यापार वार्ताओं को टालता रहा है, और यहां शर्तें इतनी अस्पष्ट हैं कि इनका मतलब बड़े बदलाव से लेकर लगभग कुछ भी न होने तक हो सकता है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
सीएनएन ने लिखा है, ''रूसी तेल ओपेक या अमेरिकी कच्चे तेल की तुलना में लगभग 16 डॉलर प्रति बैरल की बड़ी छूट पर कारोबार करता रहा है, जिससे भारत के लिए इसे छोड़ना मुश्किल हो जाता है. अमेरिका के साथ इस समझौते के बाद भी भारत प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए रूसी तेल ख़रीदता रह सकता है जैसा कि उसने पिछले कई वर्षों में किया ह
भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार और पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स के वरिष्ठ फेलो अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा, "जब तेल की क़ीमतें ऊंची थीं, तब भारत को बड़ा लाभ हो रहा था. लेकिन अब जब तेल की क़ीमतें नीचे आ रही हैं तो वह फ़ायदा उतना बड़ा नहीं रह गया है. अगर इस गणना में यह भी जोड़ दें कि ट्रंप के टैरिफ से भारतीय निर्यातक नुक़सान उठा रहे थे, तो रूसी तेल ख़रीदना बंद करना आसान हो गया."
सीएनएन से कैटो इंस्टीट्यूट के अर्थशास्त्री स्कॉट लिंसिकॉम ने कहा, "भारत पिछले कई महीनों से इन व्यापार वार्ताओं को टालता रहा है, और यहां शर्तें इतनी अस्पष्ट हैं कि इनका मतलब बड़े बदलाव से लेकर लगभग कुछ भी न होने तक हो सकता है.''
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