पिछली हार से लिया सबक, मालवा से नई रणनीति का आगाज

प्रदेश की दो-ध्रुवीय राजनीति को भेदने की तैयारी में आप
भोपाल। प्रदेश की सियासत में लगातार भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटते जनाधार को तोड़ने के लिए आम आदमी पार्टी (आप) ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल ली है। पिछले चुनाव में मिली करारी हार से बड़ा सबक लेते हुए पार्टी ने इस बार जमीनी हकीकत को समझा है। आप ने तय किया है कि वह अब किसी राजनीतिक बैसाखी या गठबंधन के सहारे नहीं, बल्कि पूरी तरह अपने बूते राज्य की राजनीति में तीसरे विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करेगी। इस नई रणनीति का केंद्र बिंदु इस बार मालवा अंचल को बनाया गया है।
पार्टी के मध्यप्रदेश प्रभारी जय भगवान उपकार ने इस नई रणनीति को अमलीजामा पहनाने के लिए मालवा अंचल को चुना है। हाल ही में इंदौर पहुंचे उपकार ने मालवा और निमाड़ क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए बैठकों का दौर शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में आगामी 14 जून को इंदौर में एक बड़ा राज्यस्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करने का फैसला लिया, जिसे पार्टी के नए चुनावी शंखनाद के रूप में देखा जा रहा है। रणनीतिकारों का मानना है कि मालवा में संगठन को मजबूत कर पूरे प्रदेश में संदेश दिया जा सकता है।
निकाय चुनाव होगा पहला लिटमस टेस्ट
पार्टी सीधे 2028 के विधानसभा चुनाव में कूदने के बजाय अपने नए संगठन की ताकत को साल 2027 में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव में आजमाएगी। आप इन निकाय चुनावों की सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी। इसे पार्टी के नए कैडर के लिए एक बड़े रिहर्सल या लिटमस टेस्ट के रूप में देखा जा रहा है।
जमानत जब्त होने के कलंक को धोने की चुनौती
गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाले इस दल ने राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव में 60 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन मध्यप्रदेश की पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति के आगे पार्टी टिक नहीं सकी और उसके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। इस बार पार्टी उस कड़वे अनुभव से सीख लेकर बूथ स्तर तक माइक्रो-मैनेजमेंट में जुटी है।
बुनियादी मुद्दों और नए संगठन पर भरोसा
हार के बाद संगठन को पूरी तरह भंग कर अब नए सिरे से प्रदेश, जोन, जिला, विधानसभा और बूथ स्तर तक व्यापक विस्तार अभियान चलाया जा रहा है। विभिन्न प्रकोष्ठों में नई नियुक्तियां की जा रही हैं। पार्टी इस बार बड़े-बड़े दावों के बजाय जनता की बुनियादी और रोजमर्रा की समस्याओं जैसेकृपानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को मुद्दा बनाकर मैदान में उतर रही है। अब देखना यह है कि मालवा की धरती से शुरू हुआ आप का यह एकला चलो का प्रयोग मध्यप्रदेश के पारंपरिक सियासी मिजाज को कितना बदल पाता है।

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