पश्चिम एशिया संकट के बीच ब्रिक्स में सहमति बनाने की बड़ी चुनौती, भारत की कूटनीति पर दुनिया की नजर

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लगातार गहराते तनाव और ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच भारत के सामने अब एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की आगामी बैठक में सदस्य देशों के बीच सहमति बनाना भारत के लिए आसान नहीं माना जा रहा, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि नई दिल्ली अपनी संतुलित विदेश नीति और संवाद आधारित दृष्टिकोण के दम पर इस कठिन परीक्षा को सफलतापूर्वक पार कर सकती है। ब्रिक्स की मौजूदा अध्यक्षता भारत के पास होने के कारण वैश्विक स्तर पर इस बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पूर्व राजदूत और गेटवे हाउस के विशिष्ट फेलो Rajiv Bhatia ने कहा है कि भारत को इस बैठक में बेहद संतुलित और व्यावहारिक रणनीति अपनानी होगी। उन्होंने माना कि ईरान-इजरायल संघर्ष को लेकर ब्रिक्स देशों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं, ऐसे में सभी पक्षों को एक मंच पर लाना चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। उनके अनुसार भारत को ऐसी सहमति तैयार करनी होगी जिसमें संघर्ष के गंभीर प्रभावों पर चिंता व्यक्त की जाए, वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहे असर को स्वीकार किया जाए और साथ ही ब्रिक्स को संवाद एवं समाधान का मंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ाया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और वैश्विक आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। भारत जैसे देशों के लिए यह संकट और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर है।

राजीव भाटिया ने कहा कि वर्तमान संकट ब्रिक्स देशों के लिए केवल चुनौती नहीं बल्कि अवसर भी है। उनके अनुसार ब्रिक्स के संस्थापक सदस्य देशों को मिलकर ऐसी पहल करनी चाहिए जो वैश्विक दक्षिण के हितों की रक्षा कर सके। उन्होंने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री स्थिरता और वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर ब्रिक्स एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनका मानना है कि यदि ब्रिक्स देश सामूहिक रूप से कोई ठोस पहल करते हैं तो यह समूह वैश्विक राजनीति में और अधिक प्रभावशाली बन सकता है।

भारत द्वारा इस बैठक की मेजबानी को भी वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि देशों को युद्ध और सैन्य टकराव के बजाय संवाद और कूटनीति के जरिए विवादों का समाधान तलाशना चाहिए। राजीव भाटिया ने कहा कि आज दुनिया को जिम्मेदार नेतृत्व की जरूरत है, जहां मिसाइलों और ड्रोन की जगह बातचीत और समझदारी को प्राथमिकता दी जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स समूह वर्तमान संकट के बावजूद अपनी मूल भावना से नहीं भटकेगा। संगठन का मूल उद्देश्य सदस्य देशों और वैश्विक दक्षिण के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है और भविष्य में भी यही इसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता रहेगी। भारत इसी दिशा में समूह को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा।

विदेश मंत्रालय द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक 14 और 15 मई को आयोजित होगी। इस दौरान दुनिया की निगाहें नई दिल्ली पर टिकी रहेंगी। बैठक के पहले दिन सुबह 10 बजे विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के पहुंचने का कार्यक्रम तय किया गया है। इसके बाद सुबह 10 बजकर 30 मिनट पर बैठक का पहला सत्र शुरू होगा।

कार्यक्रम के अनुसार सभी विदेश मंत्री दोपहर में सेवा तीर्थ जाएंगे, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संयुक्त मुलाकात का कार्यक्रम रखा गया है। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल भारत मंडपम लौटेगा, जहां दोपहर बाद बैठक का दूसरा सत्र आयोजित होगा। शाम को विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की ओर से विशेष रात्रिभोज का आयोजन किया जाएगा। बैठक का तीसरा सत्र अगले दिन 15 मई की सुबह आयोजित होगा।

राजनयिक हलकों में माना जा रहा है कि यह बैठक केवल ब्रिक्स देशों के बीच चर्चा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों पर भी महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है। भारत के लिए यह अवसर अपनी वैश्विक नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने और बहुपक्षीय मंचों पर अपनी प्रभावशाली भूमिका दिखाने का भी माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिक्स अब केवल आर्थिक मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह तेजी से वैश्विक राजनीतिक और रणनीतिक विमर्श का भी अहम केंद्र बनता जा रहा है। ऐसे में भारत की भूमिका और जिम्मेदारी दोनों बढ़ गई हैं। वर्तमान संकट के बीच यदि भारत सफलतापूर्वक सहमति बनाने में कामयाब रहता है तो यह उसकी कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जाएगा और वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति और मजबूत होगी।


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