आंतरिक शक्ति पहचानें, सशक्त समाज से ही बनेगा समर्थ राष्ट्र

संघ सरकार्यवाह होसबोले बोले हर गांव और बस्ती ले अपने विकास का दायित्व
भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने समाज की संगठनात्मक शक्ति, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र भावना को सर्वाेपरि बताते हुए कहा है कि भारत की पांच हजार वर्षों पुरानी सभ्यता ने हर बड़े संकट का डटकर सामना किया है और हर आपदा के बाद देश पहले से अधिक मजबूती के साथ उभरकर खड़ा हुआ है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज अपनी आंतरिक क्षमता को पहचाने और केवल शासन-प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं अपने गांव, बस्ती और मोहल्ले की बेहतरी का दायित्व संभाले।
राजधानी भोपाल में संघ के भोपाल विभाग द्वारा आयोजित भव्य शाखा संगम और विशाल स्वयंसेवक एकत्रीकरण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरकार्यवाह होसबोले ने भारत की अमर संस्कृति और नागरिक कर्तव्यों पर विस्तार से विचार रखे। इस ऐतिहासिक एकत्रीकरण में भोपाल विभाग के अंतर्गत आने वाले 5 जिलों से पूर्ण गणवेश में आए लगभग 30 हजार स्वयंसेवकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दत्तात्रेय होसबोले ने रामायण से भगवान हनुमान का उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार व्यक्ति और समाज अपनी असीम क्षमताओं को भूल जाते हैं। जैसे जामवंत जी के याद दिलाने पर हनुमान जी को अपनी शक्ति का अहसास हुआ, ठीक वैसे ही जब समाज को सही दिशा और मार्गदर्शन मिलता है, तो वह बड़े से बड़े असंभव कार्यों को भी सिद्ध कर दिखाता है। उन्होंने कहा कि देश के ऋषियों, विचारकों और महापुरुषों ने भारत में एक ऐसे ‘अविनाशी और मृत्युंजय समाज’ का निर्माण किया है, जो किसी भी विषम परिस्थिति में टूटना नहीं जानता।
मंच तक सीमित ना हो समाज उत्थान
महामना मदन मोहन मालवीय के विचारों का स्मरण कराते हुए सरकार्यवाह ने कहा कि देश और समाज के उत्थान का कार्य केवल मंचों तक सीमित न रहकर हर गांव, हर बस्ती और हर गली तक पहुंचना चाहिए। मालवीय जी ने भी यही मार्ग दिखाया था कि गांव-गांव में लोगों को एकत्र होकर अपने क्षेत्र की समस्याओं और आवश्यकताओं पर सामूहिक चिंतन करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सरकार या प्रशासन के भरोसे बैठकर सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने क्षेत्र के विकास की जिम्मेदारी स्वयं उठाए।
गांव और मोहल्ले में शुभ, कल्याणकारी संस्कार की चर्चा हो
संस्कृति और नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण पर जोर देते हुए होसबोले ने ग्रामे ग्रामे कथा शुभा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का जीवन महापुरुषों के आदर्शों, रामायण, महाभारत, संतों की वाणी और गुरुओं के उपदेशों से सिंचित होना चाहिए। हर गांव और मोहल्ले में शुभ, कल्याणकारी और संस्कार देने वाली बातों की चर्चा नियमित रूप से होनी चाहिए, ताकि सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहे।
 


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