आरक्षित सीटों को साधने की होड़, कहीं दरक न जाए सामान्य का किला

82 सीटों के फेर में 148 सीटों बिगड़ सकता है कांग्रेस का गणित
भोपाल। मध्य प्रदेश की सत्ता से बाहर कांग्रेस वापसी के लिए हर संभव प्रयास कर रही है, लेकिन वर्तमान में पार्टी एक आत्मघाती अंतर्द्वंद्व के जाल में फंसती नजर आ रही है। दलित और आदिवासी वोट बैंक को साधने की आक्रामक कोशिशों ने पार्टी के भीतर एक नए किस्म के वर्ग संघर्ष को जन्म दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि 82 आरक्षित सीटों पर वर्चस्व जमाने की रणनीति कांग्रेस के लिए एक तरफ जीत, दूसरी तरफ हार का सबब बन सकती है।
कांग्रेस के कुछ रणनीतिकारों ने अपनी पूरी ताकत अनुसूचित जाति (35 सीट) और अनुसूचित जनजाति (47 सीट) को रिझाने में झोंक दी है, लेकिन इस रणनीति का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक है। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 148 सीटें ऐसी हैं, जहां सवर्ण, पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अल्पसंख्यक मतदाता हार-जीत का फैसला करते हैं। केवल आरक्षित सीटों पर ध्यान केंद्रित करने से कांग्रेस का वह पारंपरिक आधार खोखला हो सकता है, जो कभी उसकी सबसे बड़ी ताकत था। सवर्ण और सामान्य वर्ग के मतदाताओं के बीच उपेक्षा का भाव पैदा होना कांग्रेस के लिए चुनावी गणित बिगाड़ सकता है। जो सवर्ण समाज कभी कांग्रेस का मजबूत वैचारिक स्तंभ माना जाता था, वह अब पार्टी की वर्तमान नीतियों के कारण खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो अनारक्षित सीटों पर कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नेताओं की बयानबाजी ने बढ़ाई मुश्किलें
पार्टी की वर्तमान दुर्दशा का एक बड़ा कारण उसके अपने नेताओं के अनियंत्रित और विवादित बयान हैं। हाल ही में विधायक फूल सिंह बरैया और अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार द्वारा सवर्णों के खिलाफ की गई तीखी बयानबाजी ने आग में घी डालने का काम किया है। इन बयानों ने न केवल विपक्षी दलों को मुद्दा दे दिया है, बल्कि पार्टी की आंतरिक कलह को भी सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है।
संगठन के मौन पर उठते सवाल
हैरानी की बात यह है कि नेताओं की इस विवादित बयानबाजी और बढ़ते असंतोष के बावजूद प्रदेश कांग्रेस संगठन ने अब तक कोई कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की है। हालांकि फूल सिंह बरैया से स्पष्टीकरण मांगा गया है, लेकिन ठोस कार्रवाई के अभाव में संगठन की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

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