क्या है गाजा का बोर्ड ऑफ पीस?: जानें ट्रंप ने भारत को क्यों भेजा शामिल होने का न्योता, क्या बनेगा UN का विकल्प

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 20 Jan 2026 06:51 PM IST

Gaza Board of Peace: गाजा में इस्राइल-फलस्तीन के झगड़े को सुलझाने के लिए जिस बोर्ड ऑफ पीस के गठन का प्रस्ताव है, वह आखिर क्या है? इसका लक्ष्य क्या है? इसके काम करने और संचालन का तरीका क्या होगा? इसका कामकाज कौन देखेगा? भारत के लिए इसमें क्या भूमिका प्रस्तावित होगी? क्या अमेरिकी राष्ट्रपति इस बोर्ड ऑफ पीस के जरिए आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र की ताकत को चुनौती देने की कोशिश कर सकते हैं? आइये जानते हैं...

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गाजा शांति योजना में शामिल होने के लिए भारत को न्योता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस्राइल-फलस्तीन के बीच स्थायी शांति लाने के लिए अमेरिका अलग-अलग देशों के नेताओं को 'गाजा बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल न्योता भेजा जा रहा है। इनमें वह देश भी शामिल हैं, जो पारंपरिक तौर पर या तो कूटनीतिक मामलों में तटस्थ रहे हैं या फिर दूसरे देशों में दखल की रणनीति का विरोध कर चुके हैं।
आखिर गाजा में इस्राइल-फलस्तीन के झगड़े को सुलझाने के लिए जिस बोर्ड ऑफ पीस का गठन करने का प्रस्ताव है, वह आखिर क्या है? इसका लक्ष्य क्या है? इसके काम करने और संचालन का तरीका क्या होगा? इसका कामकाज कौन देखेगा? भारत के लिए इसमें क्या भूमिका प्रस्तावित होगी? और आखिर में सबसे बड़ा सवाल- कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बोर्ड ऑफ पीस के जरिए आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र की ताकत को चुनौती देने की कोशिश कर सकते हैं? आइये जानते हैं...

पहले जानें- क्या है गाजा बोर्ड ऑफ पीस?

बोर्ड ऑफ पीस को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से शांति स्थापित करने के अंतरराष्ट्रीय संगठन के तौर पर पेश किया जा रहा है। व्हाइट हाउस का दावा है कि इसे मुख्यतः गाजा में इस्राइल-फलस्तीन के बीच शांति स्थापित करने के लिए प्रस्तावित किया गया है। हालांकि, अब इसे एक स्थायी बोर्ड बनाने और इसमें शामिल होने के लिए एक के बाद एक देशों को न्योता भेजे जाने के ट्रंप प्रशासन के कदमों ने दुनियाभर का ध्यान इस ओर खींचा है। 

क्या है बोर्ड ऑफ पीस का लक्ष्य?

यह बोर्ड ट्रंप की 20-सूत्रीय गाजा शांति योजना को लागू करने के लिए बनाया गया था। ट्रंप अपनी इस योजना के तहत संघर्ष वाले क्षेत्रों में स्थिरता को बढ़ावा देने, इस्राइल और फलस्तीन के अधिकारियों की मदद से कानूनी शासन बहाल करने और स्थायी शांति सुनिश्चित करने पर जोर देते रहे हैं।

क्या होगा संचालन का तरीका?

ट्रंप की ओर से प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस की संरचना तीन स्तरीय है। अगर यह गाजा में दूसरे चरण में शांति स्थापित करने की कोशिशों के लिए अस्तित्व में आता है तो यह अलग-अलग चरणों में काम करेगा।



1. संस्थापक कार्यकारी परिषद: यह सबसे शीर्ष निकाय है, जो गाजा में शांति लाने के लिए रणनीतिक दृष्टि तय करता है। इसकी अध्यक्षता खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पास रखी है और उनके पास सभी निर्णयों पर वीटो की ताकत है। इस परिषद में अमेरिका के मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रंप के सलाहकार और दोस्त स्टीव विटकॉफ, ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा जैसे सदस्य शामिल किए गए हैं।
2.  गाजा कार्यकारी बोर्ड: यह निकाय क्षेत्रीय समन्वय और गाजा में शासन के लिए जमीनी कार्यों से जुड़ा रहेगा। इस बोर्ड में तुर्किये, कतर, मिस्र और यूएई के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं।
  
3. गाजा प्रशासन के लिए राष्ट्रीय समिति (एनसीएजी): यह सबसे निचला स्तर है, जिसमें फलस्तीनी तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं, जो गाजा में स्थानीय सेवाओं (जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त) का प्रबंधन करेंगे।

प्रमुख नियुक्तियां: बल्गेरिया के राजनयिक निकोले म्लादेनोव को गाजा के लिए उच्च प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है, जो बोर्ड ऑफ पीस और स्थानीय फलस्तीनी प्रशासन (NCAG) के बीच जमीनी स्तर पर संपर्क के रूप में कार्य करेंगे।

जब बोर्ड का स्वरूप तय तो बाकी देशों को न्योता क्यों?

व्हाइट हाउस की तरफ से हाल ही में बोर्ड ऑफ पीस का जो स्वरूप पेश किया गया, उसमें इसे नई अंतरराष्ट्रीय संस्था कहा गया है, जिसे बदलावों को लागू करने के लिए बनाया गया है। शुक्रवार को रिलीज किए गए इस बोर्ड ऑफ पीस के चार्टर (संविधान) में कहा गया है कि यह न सिर्फ गाजा, बल्कि उन क्षेत्रों में भी शांति लाने में मदद करेगा, जो संघर्ष से घिरी हैं। इस चार्टर में कहा गया है कि दुनिया को अब एक चुस्त और कारगर अंतरराष्ट्रीय शांति-स्थापना संस्था चाहिए। इस लिहाज से यह तय है कि ट्रंप का यह बोर्ड ऑफ पीस आगे वैश्विक स्तर पर काम करेगा। 
फिलहाल इसका मुख्य लक्ष्य अब भी फलस्तीन का पुनर्निर्माण ही रखा गया है और इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दुनियाभर के कई अहम देशों/नेताओं को शामिल करने की बात कही गई है। ट्रंप की इस योजना को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के सदस्यों की तरफ से भी काफी समर्थन मिला है।                                                                                                  किस-किस देश को भेजा गया बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता?
डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए अब तक भारत, रूस समेत लगभग 60 से 75 देशों को न्योता भेजा गया है। खास बात यह है कि ट्रंप ने खुद वैश्विक नेताओं को व्यक्तिगत पत्र भेजकर उन्हें इस नए अंतरराष्ट्रीय संगठन का संस्थापक सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया है। यानी यह देश बोर्ड ऑफ पीस की पूरी संरचना में फैसले लेने वाले स्तर पर होंगे।

अमेरिका के निमंत्रण पर अब तक क्या रही प्रतिक्रिया?

स्वीकार करने वाले देश: मोरक्को के राजा मोहम्मद VI, अर्जेंटीना, वियतनाम, कजाकिस्तान, हंगरी और उजबेकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस बोर्ड में शामिल होना स्वीकार कर लिया है। मोरक्को इस बोर्ड में शामिल होने वाला पहला अरब देश बना है।

ये देश कर रहे विचार: रूस ने निमंत्रण मिलने की पुष्टि की है और कहा है कि वे इसकी बारीकियों को समझ रहे हैं। थाईलैंड और बेलारूस भी इस पर विचार कर रहे हैं। ब्रिटेन इस विषय पर अपने सहयोगियों से चर्चा कर रहा है। भारत ने भी अब तक इस आमंत्रण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। इस्राइल को भी बोर्ड में शामिल होने के लिए कहा गया है, हालांकि इस्राइली सरकार ने इसकी संरचना पर कुछ आपत्तियां जताई हैं।                                                                                                                                                                   इन देशों ने नकारी सदस्यता: फ्रांस ने फिलहाल इस चरण में बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। फ्रांस सरकार ने कहा है कि उसे ऐसी किसी नई संस्था के जरिए संयुक्त राष्ट्र की संरचना और सिद्धांतों के उल्लंघन की चिंता है। हालांकि, फ्रांस के इस जवाब के बाद ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सदस्यता से इनकार करते हैं तो वह फ्रांस की वाइन पर 200 फीसदी तक टैरिफ लगा सकते हैं। 

बोर्ड ऑफ पीस की सदस्यता के लिए क्या नियम, ताकत क्या होगी?

बोर्ड ऑफ पीस में सदस्यता के पैमाने और शर्तें इसके चार्टर में दी गई हैं। सबसे पहले तो इसके अस्तित्व में आने के लिए कम से कम तीन देशों की सहमति अनिवार्य है। दूसरी तरफ बोर्ड ऑफ पीस की सदस्यता स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की रखी गई है। अस्थायी सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का रखा गया है। इस सदस्यता के लिए कोई वित्तीय योगदान नहीं देना होगा। हालांकि, स्थायी सदस्यता के लिए चार्टर लागू होने के बाद सदस्य देश को 1 अरब डॉलर का योगदान देना होगा। अगर कोई देश बाद में स्थायी सदस्य बनना चाहता है तो वह 1 अरब डॉलर खर्च कर ऐसा कर सकता है।
चार्टर में यह साफ नहीं किया गया है कि अलग-अलग देशों से सदस्यता के लिए लिए गए वित्तीय सहयोग का क्या होगा,  लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप का दावा है कि वह जुटाई गई रकम को खुद नियंत्रित करेंगे और इसे गाजा के पुनर्निर्माण पर खर्च किया जाएगा।
मजेदार बात यह है कि बोर्ड ऑफ पीस की सदस्यता यूं ही दिए जाने का नियम नहीं है। बल्कि यह सिर्फ इसके अध्यक्ष- डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत आमंत्रण पर ही देने का प्रावधान है। अध्यक्ष के पास ही यह तय करने का अधिकार है कि किसे आमंत्रित करना है, किसकी सदस्यता का नवीनीकरण करना है और किसे हटाना है।
निर्णय लेने की शक्ति और वीटो: बोर्ड में हर एक सदस्य देश के पास एक वोट होगा और निर्णय बहुमत से लिए जाएंगे। हालांकि, सभी निर्णयों के लिए अध्यक्ष (ट्रंप) की अंतिम मंजूरी का प्रावधान किया गया है। इसका सीधा मतलब है कि उनके पास सभी मामलों पर वीटो शक्ति होगी।

भारत को क्यों न्योता दिया गया, इसके क्या मायने?

डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भारत को बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता देने के पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक कारण बताए गए हैं। ट्रंप की चिट्ठी में लिखा गया है कि बोर्ड ऑफ पीस में भारत जैसे प्रभावशाली देशों की भागीदारी अनिवार्य है।

ट्रंप ने भारत को उन प्रतिष्ठित राष्ट्रों के समूह का हिस्सा बताया है, जो स्थायी शांति बनाने की नेक जिम्मेदारी उठाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य में निवेश करने के लिए तैयार हैं। चिट्ठी में कहा गया है कि यह सम्मान उन देशों के लिए आरक्षित है जो उदाहरण पेश करके नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं।

गौरतलब है कि ट्रंप की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह न्योता ऐसे समय में भेजा गया है, जब भारत-अमेरिका के रिश्तों में टैरिफ और कुछ अन्य मुद्दों को लेकर तनाव है। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन ऐसे न्योते के जरिए भारत को अहम वैश्विक मुद्दों से जोड़े रखने की कोशिश में जुटा है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी इसे लेकर पोस्ट किया है और संकेत दिया है कि अमेरिका की रणनीति में भारत एक अहम साझेदार है। 
भारत में वैश्विक व्यापार मुद्दों से जुड़ी थिंक टैंक- ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के मुताबिक, इस बोर्ड में शामिल होने से भारत की बहुपक्षवाद और फलस्तीनी आत्मनिर्णय को लेकर उसकी पारंपरिक कूटनीतिक विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पुनर्निर्माण के नाम पर यह बोर्ड वाणिज्यिक परियोजनाओं और रियल एस्टेट निवेश (जैसे गाजा को 'मिडल ईस्ट रिविएरा' बनाना) को फिलिस्तीनी अधिकारों और सहमति से ऊपर प्राथमिकता दे सकता है। ऐसे में भारत के लिए यह एक सोचने वाला निमंत्रण है।

यूएन के लिए कितनी बड़ी चुनौती हो सकता है बोर्ड ऑफ पीस?

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस को कई राजनयिक और विशेषज्ञ समानांतर संयुक्त राष्ट्र 'ट्रंप का संयुक्त राष्ट्र' कह रहे हैं, जो कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और यूएन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

बोर्ड का चार्टर कहता है कि दुनिया को उन संस्थानों और दृष्टिकोणों को छोड़ने की जरूरत है, जो अक्सर विफल रहे हैं और एक फुर्तीले और प्रभावी शांति लाने वाली संस्था की जरूरत है। यानी चार्टर के जरिए ही बोर्ड ऑफ पीस सीधे तौर पर यूएन को चुनौती दे रहा है। 
विशेषज्ञों का तर्क है कि यह बोर्ड अमेरिका को संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से संबंधित पुराने अंतरराष्ट्रीय समझौतों को दरकिनार करने और उनके स्थान पर लेनदेन वाले सौदे करने की शक्ति देगा। यह उन बहुपक्षीय मानदंडों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को कमजोर कर सकता है जिन्हें संयुक्त राष्ट्र दशकों से बढ़ावा दे रहा है।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र के लोकतांत्रिक और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया के उलट बोर्ड ऑफ पीस में सभी अंतिम निर्णय डोनाल्ड ट्रंप के पास होंगे। वे न सिर्फ इसके अध्यक्ष होंगे, बल्कि उनके पास किसी भी निर्णय को रोकने की वीटो शक्ति भी होगी, जो संयुक्त राष्ट्र की जटिल वीटो प्रणाली को चुनौती देती है।

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