भोपाल. नौकरी का दबाव, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाएं और संतान प्राप्ति से जुड़ी परेशानियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं. भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मानसिक रोगियों की संख्या में दर्ज वृद्धि और महिलाओं में मनोवैज्ञानिक तनाव को लेकर सामने आए शोध के आंकड़े इस समस्या के अलग-अलग पहलुओं की ओर ध्यान खींचते हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अस्पताल में वर्ष 2021 में 8,589 मरीज पहुंचे थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 18,003 हो गई. यानी चार साल में मरीजों की संख्या लगभग 110 प्रतिशत बढ़ी. हालांकि, अस्पताल में मरीजों की संख्या बढ़ना अपने आप में शहर में डिप्रेशन की वास्तविक दर दोगुनी होने का प्रमाण नहीं है. इसके पीछे बीमारी के प्रति जागरूकता, उपचार तक पहुंच और अस्पताल में पंजीकरण की प्रवृत्ति जैसे कारण भी हो सकते हैं.
हमीदिया अस्पताल के उपलब्ध आंकड़े मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती जरूरत को दर्शाते हैं. वर्ष 2021 में 8,589 मरीज दर्ज किए गए थे. वर्ष 2022 में यह संख्या बढ़कर 13,104 हो गई, जबकि 2025 में 18,003 मरीज अस्पताल पहुंचे.
इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 2021 से 2022 के बीच मरीजों की संख्या में लगभग 52.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसके बाद 2022 से 2025 के बीच संख्या में करीब 37.4 प्रतिशत का इजाफा दर्ज हुआ. वर्ष 2021 और 2025 के बीच कुल बढ़ोतरी लगभग 109.6 प्रतिशत रही.
यह वृद्धि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते दबाव का संकेत देती है, लेकिन इसकी सही व्याख्या के लिए मरीजों की श्रेणी, अस्पताल में आने के कारण और आंकड़ों के संकलन की पद्धति को समझना जरूरी है. उपलब्ध विवरण में मानसिक रोगियों की कुल संख्या दी गई है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें कितने मरीज डिप्रेशन से पीड़ित थे और कितने अन्य मानसिक समस्याओं के उपचार के लिए पहुंचे थे.
गांधी मेडिकल कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी के अनुसार, मरीजों की संख्या में वृद्धि के पीछे जागरूकता, इलाज की उपलब्धता और अस्पताल तक पहुंच जैसे कारण भी हो सकते हैं. ऐसे में बढ़ते आंकड़ों को मानसिक बीमारियों के वास्तविक प्रसार और स्वास्थ्य सेवाओं के अधिक इस्तेमाल, दोनों के संदर्भ में देखना आवश्यक है.
कामकाज की जगह पर लगातार दबाव मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है. समयसीमा में काम पूरा करने की बाध्यता, लंबे कार्य घंटे, नौकरी की असुरक्षा और करियर में आगे बढ़ने की चिंता कई कर्मचारियों के लिए तनाव का कारण बनती हैं. जब ऐसी परिस्थितियां लंबे समय तक बनी रहती हैं और व्यक्ति को पर्याप्त आराम या सहयोग नहीं मिलता, तो दैनिक जीवन और कामकाज पर असर पड़ सकता है.
पंडित खुशीलाल आयुर्वेद कॉलेज के एक शोध में सात पेशों से जुड़े लोगों में 16 प्रतिशत में अवसाद पाए जाने का उल्लेख किया गया है. इस आंकड़े के अनुसार, अध्ययन में शामिल प्रत्येक 100 लोगों में लगभग 16 लोग अवसाद से प्रभावित थे. हालांकि, शोध में शामिल लोगों की कुल संख्या, अध्ययन की अवधि और पेशों के अनुसार अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए इस परिणाम को भोपाल के सभी कर्मचारियों या पूरे शहर की आबादी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता.
शोध में पुरुषों और महिलाओं में अवसाद का अनुपात समान बताया गया है. यह तथ्य कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य को केवल किसी एक लिंग से जुड़ी समस्या मानने के बजाय व्यापक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत बताता है.
कार्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संवाद, काम के उचित घंटे, कर्मचारियों को आवश्यक सहयोग और तनाव के शुरुआती संकेतों की पहचान महत्वपूर्ण हो सकती है. लगातार थकान, एकाग्रता में कमी, काम में रुचि घटना और नींद प्रभावित होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. हालांकि, इन लक्षणों के आधार पर स्वयं डिप्रेशन का निष्कर्ष निकालने के बजाय योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है.
महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू बांझपन है. उपलब्ध शोध-सारांश के अनुसार, 32 अध्ययनों और 1.24 लाख महिलाओं के विश्लेषण में बांझपन का सामना कर रही महिलाओं में अन्य महिलाओं की तुलना में मनोवैज्ञानिक तनाव 1.63 गुना अधिक पाया गया.
इसका अर्थ है कि तुलनात्मक स्तर पर तनाव का मापा गया स्तर लगभग 63 प्रतिशत अधिक था. यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि 63 प्रतिशत अधिक तनाव का अर्थ यह नहीं है कि बांझपन से जूझ रही 63 प्रतिशत महिलाएं तनावग्रस्त हैं. यह अध्ययन में सामने आया तुलनात्मक अंतर है, न कि प्रभावित महिलाओं का प्रतिशत.
संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी नहीं होने पर भावनात्मक दबाव के साथ परिवार और समाज की अपेक्षाएं भी परेशानी बढ़ा सकती हैं. बार-बार उपचार कराना, चिकित्सा संबंधी खर्च, उपचार के परिणामों को लेकर अनिश्चितता और रिश्तों में तनाव भी कुछ महिलाओं के अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं.
हालांकि, सभी महिलाओं के अनुभव एक जैसे नहीं होते. तनाव की तीव्रता व्यक्तिगत परिस्थितियों, सामाजिक सहयोग, उपचार की स्थिति और अन्य कारकों पर निर्भर कर सकती है. इसलिए बांझपन को केवल शारीरिक स्वास्थ्य का विषय मानने के बजाय उसके भावनात्मक और सामाजिक पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है.
उपलब्ध जानकारी में 53 अध्ययनों के विश्लेषण का भी उल्लेख है, जिसमें महिलाओं का औसत तनाव स्कोर पुरुषों से अधिक पाया गया. यह निष्कर्ष महिलाओं और पुरुषों के बीच तनाव के अनुभव में संभावित अंतर की ओर संकेत करता है. हालांकि, तनाव स्कोर और चिकित्सकीय रूप से निदान किए गए डिप्रेशन को एक ही मानना सही नहीं होगा.
तनाव, चिंता और डिप्रेशन एक-दूसरे से संबंधित हो सकते हैं, लेकिन ये अलग-अलग स्थितियां हैं. किसी अध्ययन में तनाव का औसत स्कोर अधिक मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित समूह में डिप्रेशन की दर भी उतनी ही अधिक है. इसके लिए बीमारी के स्पष्ट मानदंडों और अलग-अलग आंकड़ों की आवश्यकता होती है.
महिलाओं पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, सामाजिक अपेक्षाओं और प्रजनन संबंधी दबाव का प्रभाव उनकी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है. ऐसे मामलों में परिवार का सहयोग, बिना दोषारोपण के बातचीत और जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक सहायता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
हमीदिया अस्पताल में मरीजों की संख्या में वृद्धि, कार्यस्थल पर अवसाद से जुड़े शोध और बांझपन का सामना कर रही महिलाओं में अधिक मनोवैज्ञानिक तनाव—ये तीनों तथ्य मानसिक स्वास्थ्य को अलग-अलग स्तरों पर समझने की जरूरत बताते हैं.
अस्पतालों के आंकड़े स्वास्थ्य सेवाओं की मांग के बारे में जानकारी देते हैं, जबकि शोध किसी विशेष समूह में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को समझने में मदद करते हैं. इन दोनों प्रकार के आंकड़ों की तुलना करते समय अध्ययन की आबादी, बीमारी की परिभाषा और आंकड़े जुटाने के तरीके को ध्यान में रखना जरूरी है.
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की समय पर पहचान और उपचार के लिए जागरूकता के साथ सुलभ परामर्श सेवाएं भी आवश्यक हैं. लगातार उदासी, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि कम होना, नींद या भूख में बदलाव और दैनिक कामकाज में परेशानी जैसे लक्षण बने रहने पर विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए.
मानसिक स्वास्थ्य की समस्या का सामना कर रहे व्यक्ति को कमजोर समझना या दोष देना स्थिति को और कठिन बना सकता है. परिवार, कार्यस्थल और स्वास्थ्य संस्थानों में सहयोगपूर्ण वातावरण तैयार करना इसलिए महत्वपूर्ण है.
भोपाल में अस्पताल पहुंचने वाले मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या पर आगे स्पष्ट निष्कर्ष निकालने के लिए डिप्रेशन के अलग-अलग आंकड़े, मरीजों की आयु और अन्य सामाजिक विवरण तथा कई वर्षों के तुलनात्मक आंकड़े जरूरी होंगे. फिलहाल उपलब्ध जानकारी यह संकेत देती है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत और तनाव से जुड़े सामाजिक कारकों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है.