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1 फर्जी पतों, बिना रजिस्ट्रेशन वाले स्व सहायता समूहों के जरिए बांटा 12 करोड़ का खाना
कैग की रिपोर्ट में खुलासा, कागजों पर किचन, मौके पर काम करते मिले पुरुष कर्मचारी’ भोपाल। प्रदेश में नौनिहालों और गर्भवती महिलाओं के पोषण के नाम पर किस कदर धांधली चल रही है, इसका एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग में चल रहे ताजा गर्म पके हुए भोजन घोटाले से पर्दा उठाया है। मार्च 2024 तक की अवधि के ऑडिट में सामने आया कि नियमों को ताक पर रखकर12.21 करोड़ रुपए का भुगतान ऐसे स्वयं सहायता समूहों को कर दिया गया, जो या तो बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे थे या कागजों में गायब थे। कैग की रिपोर्ट में खुलसा हुआ है कि जांच किए गए 13 जिलों में से 7 जिलों मंडला, बुरहानपुर, दतिया, सीहोर, शाजापुर और श्योपुर में 54 बिना रजिस्ट्रेशन वाले स्व-सहायता समूहों ने 252 आंगनवाड़ी केंद्रों में 8.1 करोड़ रुपये का खाना सप्लाई कर दिया। अलीराजपुर, सीहोर और टीकमगढ़ में 13 स्व-सहायता समूहों का कोई वजूद ही नहीं मिला। जिला कार्यक्रम अधिकारियों को दिए गए बिलों पर दर्ज पते पर जब ऑडिट टीम पहुंची, तो वहां न कोई किचन मिला और न ही दफ्तर। नियमों के मुताबिक स्व सहायता समूह में बाहरी ठेकेदार या पुरुष शामिल नहीं हो सकते, लेकिन जब सेक्टर सुपरवाइजरों ने ऑडिटरों को असली ठिकाने पर भेजा, तो वहां पुरुष कर्मचारी खाना बनाते मिले। कर्मचारियों ने कबूला कि वे स्व सहायता समूह के नाम पर 10,000 से 13,000 रुपये महीने की सैलरी पर काम कर रहे थे। 4.11 करोड़ का संदिग्ध भुगतान जांच में पाया गया कि इन तथाकथित सेंट्रलाइज्ड किचन के जरिए 132 आंगनवाड़ी केंद्रों को खाना बांटा गया, जिसके एवज में अधिकारियों ने बिना जांच-परख के 4.11 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया। ऑडिट के दौरान किसी भी केंद्र या किचन में स्टॉक रजिस्टर, बर्तनों की इन्वेंट्री, किचन लॉग या रोजाना की खपत का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। नियमों की धज्जियां उड़ीं शासकीय नियमों के अनुसार एक स्व-सहायता समूह अधिकतम 10 आंगनवाड़ी केंद्रों को ही भोजन सप्लाई कर सकता है। कोई भी ठेकेदार, व्यापारी या सरकारी कर्मचारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी समूह से नहीं जुड़ा हो सकता। कैग की रिपोर्ट यह स्पष्ट किया है कि इन सभी गाइडलाइंस को नजरअंदाज कर निजी ठेकेदारों ने स्व-सहायता समूहों के नाम का इस्तेमाल करते हुए करोड़ों का फर्जीवाड़ा अंजाम दिया। 2 बरकतउल्ला विवि के कुलगुरू का इस्तीफा मंजूर अनुपम राजन को कुलगुरु का अतिरिक्त भोपाल। बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. विवेक शर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ने उनका त्यागपत्र तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है। साथ ही नए कुलगुरु की नियुक्ति होने तक उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन को कुलगुरु का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। राजभवन की ओर से 23 जुलाई को जारी आदेश के अनुसार, प्रो. विवेक शर्मा ने 22 जुलाई को अपना त्यागपत्र सौंपा था। कुलाधिपति ने इसे स्वीकार करते हुए उनके कार्यभार से संबंधित पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया है। आदेश में कहा गया है कि बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में नियमित कुलगुरु की नियुक्ति होने तक अपर मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा विभाग अनुपम राजन अपने मौजूदा प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ विश्वविद्यालय के कुलगुरु का अतिरिक्त कार्यभार भी संभालेंगे। यह व्यवस्था अगले आदेश तक प्रभावी रहेगी। राजभवन द्वारा जारी आदेश में प्रो. विवेक शर्मा के इस्तीफे के कारणों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। फिलहाल नए कुलगुरु की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने तक अनुपम राजन विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी संभालेंगे। 3 असुरक्षित जगह शिफ्ट किया वार्ड तो करेंगे उग्र आंदोलन हमीदिया के रेडियोलॉजी विभाग में इमरजेंसी शिफ्ट करने का कड़ा विरोध भोपाल। भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों का सब्र एक बार फिर जवाब दे रहा है। कमला नेहरू अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं को हटाए जाने के फैसले के खिलाफ पीड़ितों ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। गुरूवार को चार प्रमुख पीड़ित संगठनों के बैनर तले आयोजित विशाल धरने में सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी गई कि अस्पताल की सुविधाओं में किसी भी तरह का बदलाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पीड़ित संगठनों ने सरकार की इस पूरी योजना को अवैध, असुरक्षित और संवैधानिक अधिकारों का सीधा हनन करार दिया है। धरने को संबोधित करते हुए भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी ने स्थानांतरण की योजना पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी वार्ड को हमीदिया अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में शिफ्ट करना गैस पीड़ितों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। वहां लगातार हानिकारक विकिरण (रेडिएशन) का खतरा बना रहता है। इस खतरनाक फैसले से पहले न तो कोई स्वतंत्र रेडियोलॉजिकल सुरक्षा आकलन कराया गया है और न ही परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड से नियमानुसार अनुमति ली गई है। पीड़ितों का आरोप है कि परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की ओर से मिली मंजूरी में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि उस क्षेत्र में मरीजों का वेटिंग एरिया नहीं बनाया जा सकता। इसके बावजूद हमीदिया अस्पताल प्रशासन और पीईटी सीटी के ठेकेदार मनमानी करते हुए गैस पीड़ितों को उस असुरक्षित माहौल में धकेलने पर आमादा हैं। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति ने भी जताया कड़ा विरोध इस संवेदनशील मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित निगरानी समिति ने भी कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने अपर मुख्य सचिव गैस राहत एवं पुनर्वास को पत्र लिखकर इस स्थानांतरण का कड़ा विरोध किया है और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर सवाल उठाए हैं। संगठनों की प्रमुख मांगें इमरजेंसी वार्ड को शिफ्ट करने की योजना पर स्थायी रोक लगे और इसे अस्पताल की मूल स्थिति में ही बहाल रखा जाए, पीईटी-सीटी केंद्र को गांधी मेडिकल कॉलेज परिसर में स्थापित किया जाए, जैसा कि मूल टेंडर में प्रावधान किया गया था, कमला नेहरू अस्पताल में किसी भी प्रकार के रेडियोधर्मी बंकर निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जाए, जब तक कि पूर्ण सार्वजनिक सुरक्षा आकलन और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की मंजूरी न मिल जाए, गैस पीड़ितों के इलाज और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े हर फैसले में सुरक्षा मानकों का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित किया जाए। 4 पेसा मोबिलाइज़र्स की सेवा समाप्त, 4,730 युवा हुए कार्यमुक्त योजना की अवधि खत्म होने के बाद कार्यमुक्त करने का लिया फैसला भोपाल। प्रदेश के आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में पेसा कानून को जमीन पर उतारने, ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने और प्रशासनिक कड़ियों को जोड़ने वाले 4,730 पेसा मोबिलाइज़र्स को बड़ा झटका लगा है। राज्य सरकार ने प्रदेश में तैनात इन सभी मोबिलाइज़र्स की सेवाएं पूरी तरह समाप्त कर दी हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने खुद इस फैसले की आधिकारिक पुष्टि की है। मंत्री पटेल ने बताया कि पेसा मोबिलाइज़र्स की सेवाएं भारत सरकार की राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान योजना के तहत ली गई थीं। इस योजना की निर्धारित अवधि 31 मार्च 2026 को पूरी हो चुकी है, जिसके परिणामस्वरूप नियमानुसार इनकी सेवाएं समाप्त की गई हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पेसा मोबिलाइज़र का पद पूरी तरह से अस्थायी और अंशकालिक (पार्ट-टाइम) प्रकृति का था। अब पेसा कानून और योजनाओं का क्रियान्वयन पंचायत स्तर पर मौजूद अन्य नियमित और विद्यमान अमले के जरिए कराया जाता रहेगा। सरकार के इस फैसले से प्रदेश के 20 जिलों के 4,730 युवा सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। छिंदवाड़ा में 263, बालाघाट में 168 मोबिलाइज़र्स किए कार्यमुक्त सरकार के इस फैसले के तहत आंकड़ों पर नजर डालें तो अकेले डिंडोरी, मंडला और सिवनी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में बड़ी संख्या में मोबिलाइज़र्स कार्यमुक्त किए गए हैं। मंडला जिले में 463, डिंडोरी में 350, सिवनी में 335, छिंदवाड़ा जिले में 266, बैतूल जिले में 263 और बालाघाट में 168 मोबिलाइज़र्स कार्यमुक्त किए गए हैं। 5 दतिया में प्रत्याशी पीछे, मोर्चे पर दोनों दलों के कप्तान दो सियासी दिग्गजों के बीच रणनीति और संगठन की सीधी जंग भोपाल। दतिया विधानसभा उपचुनाव का रण अब महज दो प्रत्याशियों की जीत-हार तक सीमित नहीं रहा है। दतिया की जमीन पर इस वक्त चुनावी पोस्टर-बैनर से ज्यादा चर्चा दोनों मुख्य दलों के कप्तानों की साख की हो रही है। प्रत्याशी पृष्ठभूमि में चले गए हैं और अग्रिम मोर्चे पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल तथा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी खुद कमान संभाले खड़े हैं। दतिया का यह मुकाबला अब सीधे तौर पर दो सियासी दिग्गजों के बीच रणनीति, दूरदर्शिता और संगठनात्मक क्षमता की सीधी जंग बन चुका है। दोनों ही दलों के प्रदेश प्रमुखों के लिए यह चुनाव उनके सांगठनिक नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। भाजपा के लिए यह सीट बरकरार रखकर अपने राजनीतिक वर्चस्व को कायम रखने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के लिए दतिया में सेंध लगाकर प्रदेश की राजनीति में दमदार वापसी का संदेश देने का सुनहरा मौका है। यही कारण है कि दोनों अध्यक्षों ने दतिया को अपनी साख का सवाल बना लिया है। खंडेलवाल और पटवारी का पूरा ध्यान इस समय दतिया के हर बूथ, हर वार्ड और हर गांव की नब्ज पकड़ने पर टिका हुआ है। संगठन की माइक्रो प्लानिंग बनाम जनसंपर्क का चक्रव्यूह चुनावी बिसात पर दोनों कप्तानों की रणनीति अलग और बेहद आक्रामक नजर आ रही है। जहां प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का पूरा जोर पार्टी के कैडर को सक्रिय रखने और माइक्रो मैनेजमेंट पर है। वे लगातार सांगठनिक बैठकें कर कार्यकर्ताओं में नया जोश भर रहे हैं। प्रदेश सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों को घर-घर तक पहुंचाने की रणनीति के साथ वे भाजपा के अभेद्य किले को और मजबूत करने में जुटे हैं। दूसरी तरफ, जीतू पटवारी सीधे जनता के बीच उतरकर आक्रामक शैली में मोर्चा संभाले हुए हैं। गांव-गांव जाकर चौपालें लगाना, पदयात्राएं और नुक्कड़ सभाएं करना उनकी कार्यशैली का मुख्य हिस्सा बन चुका है। पटवारी स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ बेरोजगारी, किसान और युवाओं के ज्वलंत प्रश्नों को उठाकर सरकार की घेराबंदी कर रहे हैं। जुटने लगे बड़े नेता जब जंग कप्तानों के बीच हो, तो पूरी सेना का मैदान में उतरना लाजमी है। दतिया में इस समय दोनों ही पार्टियों के दिग्गज नेताओं और स्टार प्रचारकों का तांता लगा हुआ है। केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और वरिष्ठ रणनीतिकारों को अलग-अलग इलाकों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। दतिया का हर इलाका हाई-प्रोफाइल प्रचार का केंद्र बन चुका है। नतीजे तय करेंगे संगठन का दम दतिया उपचुनाव के परिणाम केवल एक नया विधायक तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी स्पष्ट कर देंगे कि प्रदेश में किस पार्टी का संगठन ज्यादा अनुशासित व मजबूत है और किस कप्तान की चुनावी बिसात ज्यादा सटीक साबित हुई। दतिया का यह महासंग्राम यह साबित करने जा रहा है कि जनता को खंडेलवाल की सांगठनिक किलेबंदी पर ज्यादा भरोसा है या पटवारी के जनसंपर्क और आक्रामक तेवरों पर। |
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