
एंटीबायोटिक को लेकर विशेष अभियान।
राज्य ब्यूरो, नईदुनिया, भोपाल। संक्रामक बीमारियों में एंटीबायोटिक दवाओं के कम होते प्रभाव को रोकने के लिए सरकार अब बड़ा कदम उठाने जा रही है। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद प्रभावी कदम उठाने के लिए कार्ययोजना (एक्शन प्लान 2.0) बनाई गई है।
रविवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे जारी किया था। इसमें बड़ा प्रविधान यह किया गया है कि अब संबंधित विभागों को अलग से राशि आवंटित की जाएगी, जिसका उपयोग शोध, जागरूकता, मानव संसाधन के लिए किया जाएगा।
एंटीबायोटिक दवाओं के तर्कसंगत उपयोग के लिए जरूरी है कि कल्चर सेंसिटिविटी टेस्ट से उपयुक्त मिलने वाली दवा ही दी जाए पर प्रदेश में अधिकतर जिलों में माइक्रोबायोलाजिस्ट ही नहीं हैं, जिससे कल्चर टेस्ट नहीं हो पा रहा है। इनके नहीं होने से यह पता भी नहीं चल पाता कि काैन सी दवाएं बेअसर हो रही हैं।
अब नई कार्ययोजना में हर जिला अस्पताल में माइक्रोबायोलाजिस्ट के एक-दो पद स्वीकृत करने की तैयारी है। इसके लिए कैबिनेट में प्रस्ताव जाएगा। इसके बाद भर्ती की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी।
बता दें कि लगभग छह वर्ष पहले भी स्वास्थ्य विभाग ने कार्ययोजना बनाकर कुछ काम किया था, पर बजट नहीं होने से ज्यादा प्रभावी नहीं रहा। पशुओं में एंटीबायोटिक का उपयोग भी बिना कल्चर टेस्ट के किया जाता है। पोेल्ट्रीफार्मों में मुर्गा-मुर्गियों को कोई संक्रामक बीमारी नहीं लगने पाए इसलिए पहले से ही एंटीबायोटिक दे दी जाती है। दूध, मांस व अन्य माध्यमों से यह दवाएं मानव तक पहुंचती हैं।
प्रदेश में पशुपालन विभाग में एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग के लिए कोई गाइडलाइन नहीं है। अब नई कार्ययोजना में मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने की तैयारी है। इसमें स्पष्ट रहेगा कि किस बीमारी में कौन सी दवा देनी है। एक्सपायर एंटीबायोटिक दवाओं का निष्पादन किस तरह से करना है।
यह भी तैयारी है कि स्वास्थ्य विभाग के अस्पतालों की तरह पशुपालन के अस्पतालों का भी गुणवत्ता मानकों के आधार पर मूल्यांकन कराया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग के अस्पतालों में कायाकल्प और नेशनल क्वालिटी एश्यारेंस स्टैंडर्ड (एनक्यूएएस) के लिए प्रमाणीकरण कराया जाता है।
इसमें एंटीबायोटिक और संक्रमण रोकथाम प्रमुख हिस्सा है। एंटीबायोटिक दवाओं का निष्प्रभावी होना बड़ी चुनौती है। अभी तक 40 से 45 तरह की एंटीबायोटिक चलन में आ चुकी हैं, जिनमें कई तो बिल्कुल निष्प्रभावी हो गई हैं। सर्दी-जुकाम में लोग हाई एंटीबायोटिक खा रहे हैं। कुछ दिन खाने के बाद जब आराम लग जाता है तो दवा बंद कर देते हैं।
पशुओं के उपचार में इनका बहुत उपयोग होता है जो किसी न किसी रूप मानव शरीर में पहुंचती हैं। इस कारण दवाओं का असर कम होता जा रहा है।
दूसरा, अस्पताल में संक्रमण रोकथाम प्रभावी नहीं होने पर एक रोगी का संक्रमण दूसरे को लगता है। पहले वाले रोगी पर दवा रजिस्टेंट (बेअसर) है तो नए पर भी वैसी ही स्थित रहेगी। सरकार को इसके लिए बेहद गंभीर कदम उठाने की आवश्यकता है। डा. पंकज शुक्ला पूर्व डायरेक्टर एनएचएम