कागजों पर नारी शक्ति, मैदान में 90 फीसदी पुरुष राज

तीन दशक 30 से 35 फीसदी हुआ आरक्षण, लेकिन 1.04 लाख पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 11 हजार महिलाएं
भोपाल। प्रदेश सरकार भले ही महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण महकमे यानी पुलिस विभाग में आधी आबादी की हिस्सेदारी आज भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। सरकारी राजपत्रों में महिलाओं के लिए आरक्षण का आंकड़ा पिछले 27 सालों में 30 से बढ़कर 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी पुलिस बल में 90 प्रतिशत कब्जा पुरुषों का ही है। विभाग में तैनात करीब 1.04 लाख पुरुष कर्मियों के मुकाबले महिला पुलिसकर्मियों की संख्या महज 11,000 के आसपास सिमटी हुई है।

पुलिस भर्ती में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का सिलसिला लगभग तीन दशक पहले शुरू हुआ था, जो तीन बड़े कानूनी पड़ावों से गुजरा है। दिग्विजय सरकार (1997) में 16 मई 1997 को पहली बार 30 प्रतिशत आरक्षण की अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद शिवराज सरकार (2014) में 19 जून 2014 को इस कोटे को बढ़ाकर 33 प्रतिशत कर दिया गया था। इसके बाद  राज्य की डा मोहन यादव सरकार (2023) में 3 अक्टूबर 2023 को इसे और बढ़ाकर 35 प्रतिशत किया गया। आश्चर्य की बात यह है कि तीन-तीन सरकारों के प्रयासों और आरक्षण में लगातार वृद्धि के बावजूद विभाग में महिलाओं की कुल भागीदारी 10-11 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पा रही है।

एसएएफ में सिर्फ 70 महिलाएं
महिला प्रतिनिधित्व की सबसे बदतर स्थिति स्पेशल आर्म्ड फोर्स (एसएसफ) में देखने को मिलती है। यह विंग व्यवहारिक रूप से सिर्फ पुरुषों की नीति पर चलता नजर आता है। यहां के 23,000 कर्मियों के बेड़े में महज 70 महिलाएं तैनात हैं। इसी तरह मिनिस्ट्रियल स्टाफ, सीआईडी और एलआईबी जैसी विशेष शाखाओं में भी महिलाओं की संख्या केवल कुछ सौ तक ही सीमित है।

जिला बल की स्थिति मामूली बेहतर
सशस्त्र बलों की तुलना में जिला बल (डीएफ) में स्थिति थोड़ी संतोषजनक कही जा सकती है। यहां कुल 68,500 कर्मियों में से करीब 8,500 महिलाएं अपनी सेवाएं दे रही हैं, जबकि 60,000 पुरुष तैनात हैं। हालांकि, यह आंकड़ा भी तय 35 प्रतिशत के लक्ष्य से बहुत पीछे है।

एक नज़र आंकड़ों पर
कुल पुरुष कर्मियों की संख्या करीब 1.04 लाख है। इनमें ’कुल महिला कर्मियों की संख्या करीब 11,000 एसएएफ में महिलाएं की संख्या मात्र 70 हैं जबकि बल 23,000 का है। आरक्षण का वर्तमान स्तर  35 फीसदी है। जबकि वास्तविक भागीदारी करीब 10.5 फीसदी ही है।


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