केजरीवाल को कोर्ट से झटका: जस्टिस शर्मा ही करेंगी सुनवाई, आवेदन खारिज; कहा- निर्णय दबाव में नहीं लिए जाते

गौरव बाजपेई, नई दिल्ली Published by: Vijay Singh Pundir Updated Mon, 20 Apr 2026 08:07 PM IST

आबकारी नीति मामले में अदालत ने सख्त टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, मैं इन आवेदनों को खारिज कर रही हूं क्योंकि मेरी शपथ संविधान के प्रति है और संविधान हमें बताता है कि निर्णय दबाव में नहीं लिए जाते। मैं इस मामले की सुनवाई से नहीं हटूंगी।

Delhi Excise Policy Case Update Arvind Kejriwal case Hearing in Delhi High Court

आबकारी मामले में कोर्ट की तल्ख टिप्पणी - फोटो : अमर उजाला GFX

विस्तार

आबकारी नीति मामले में आज हाईकोर्ट अरविंद केजरीवाल की रिक्यूजल याचिका पर अपना फैसला सुनाया। केजरीवाल दिल्ली हाईकोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। इस दौरान केजरीवाल ने अपना जवाबी हलफनामा रिकॉर्ड पर लेने की मांग की। सुनवाई को दौरान केजरीवाल ने कहा, मैडम अगर मेरा जवाब रिकॉर्ड पर नहीं लिया गया तो यह न्याय के प्रति लापरवाही होगी।

 
 
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अदालत ने की सख्त टिप्पणी
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा यदि किसी न्यायाधीश का फैसला ऊपरी अदालत द्वारा बदला जाता है तो किसी भी प्रतिवादी को यह कहने का हक नहीं है कि आमुख जज फैसला करने योग्य नहीं हैं। जज की क्षमताओं पर फैसला इसकी उच्च अदालत करती है ना की प्रतिवादी।अदालत में अखिल भारतीय देवता परिषद के कार्यक्रमों में न्यायमूर्ति के शामिल होने पर कहा कि वह महिला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुई थीं, जिसमें उन्होंने जूनियर वकीलों और अन्य बार के सदस्यों को संबोधित किया था। केवल अरविंद केजरीवाल की आईडियोलॉजी से सहमति न रखने के चलते यह आरोप गलत है।                                                                                                                            न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा मेरा न्यायिक करियर 34 वर्षों का रहा है। क्या अब यह हो सकता है कि जजों को वादकारी द्वारा तय अतिरिक्त परीक्षा पास करनी पड़े कि वे मामले की सुनवाई के योग्य हैं? क्या उन्हें वादकारी द्वारा बनाए गए मानकों के आधार पर पहले खुद को साबित करना होगा? ऐसे में जजों को यह भी साबित करना पड़ेगा कि उन्होंने किसी संगठन के कार्यक्रम में भाग नहीं लिया या उनके परिवार के सदस्य विधि पेशे में नहीं हैं। 
कैच-22 रणनीति पर अदालत सख्त
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि आवेदक ने अपने लिए 'विन-विन' या कैच-22 की स्थिति बना ली है। यदि अदालत खुद को अलग करती है तो उसके दावे सही ठहरेंगे, और यदि नहीं करती है तो वह फिर भी फैसले पर सवाल उठा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसी रणनीतियों की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया और संस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ने का खतरा है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि इस मामले में मुझे ऐसी स्थिति में रखा गया है कि यदि मैं खुद को अलग करती हूं तो क्या होगा और यदि नहीं करती हूं तो क्या होगा। अगर उसे राहत नहीं मिलती है, तो वह कहेगा कि उसने पहले ही परिणाम का अनुमान लगा लिया था। अगर उसे राहत मिलती है, तो वह कह सकता है कि अदालत ने दबाव में आकर फैसला किया। वादकारी स्थिति को अपने पक्ष के अनुसार पेश कर सकता है।

'जज को कटघरे में खड़ा करने की इजाजत नहीं'
अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता हेगड़े के 'अग्निपरीक्षा' वाले तर्क का संज्ञान लिया, लेकिन सवाल उठाया कि केवल प्रतिकूल परिणाम के डर से किसी आरोपी के कहने पर जज को ऐसी परीक्षा से क्यों गुजरना चाहिए। अदालत ने कहा कि आरोपी अपनी बेगुनाही साबित कर सकता है, लेकिन उसे यह अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह जज को पक्षपाती साबित करने की कोशिश करे। अदालत ने कहा कि जब किसी मौजूदा जज पर आरोप लगाए जाते हैं, तब भी वही निष्पक्षता लागू होनी चाहिए। कोई भी राजनेता, चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, बिना किसी ठोस साक्ष्य के जज के खिलाफ आरोप लगाकर संस्था को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि अदालत कक्ष को धारणाओं का मंच नहीं बनाया जा सकता।

'एक पक्षकार और स्वयं मेरे बीच के विवाद पर निर्णय करना पड़ रहा'
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा दुर्भाग्य से आज मुझे दो पक्षकारों के बीच विवाद नहीं, बल्कि एक पक्षकार और स्वयं मेरे बीच के विवाद पर निर्णय करना पड़ रहा है। वर्तमान आवेदनों को स्वीकार करना जज पर लगाए गए आरोपों को मान्यता देने जैसा होगा। जब ऐसी स्थिति आती है, तो यह अदालत अपने और संस्था के पक्ष में खड़ी रहेगी। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि अंत में मैं यह जोड़ना चाहूंगी कि साक्ष्य मांगने वाली फाइल साक्ष्यों के साथ नहीं, बल्कि इशारों और आरोपों के साथ आई।

जस्टिस शर्मा ही करेंगी सुनवाई
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, मैं इन आवेदनों को खारिज कर रही हूं क्योंकि मेरी शपथ संविधान के प्रति है और संविधान हमें बताता है कि निर्णय दबाव में नहीं लिए जाते। मैं इस मामले की सुनवाई से नहीं हटूंगी।

अदालत में मुख्य ममले से जुड़े प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है। प्रतिवादियों को शनिवार तक अपना जवाब दाखिल करना होगा। अदालत में  29 और 30 अप्रैल को मामले में बहस के लिए सूचीबद्ध किया है

इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा, पूरे देश में जब भी फैसला सुरक्षित हो जाता है तो ऐसे में कोई भी एडिशनल एफिडेविट रिकॉर्ड पर नहीं लिया जाता लेकिन अदालत ने फिर भी केजरीवाल के एडिशनल एफिडेविट को रिकॉर्ड पर लिया है।  वहीं, न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, सॉलिसिटर जनरल सही कह रहे हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया है वह सभी लोगों पर बराबर है किसी व्यक्ति विशेष के लिए बदली नहीं जा सकती। हालांकि, अदालत ने चुकि केजरीवाल स्वयं अपना पक्ष रख रहे थे ऐसे में उन्हें थोड़ी राहत देते हुए एडिशनल एफिडेविट को रिकॉर्ड पर ले लिया।

अदालत में केजरीवाल के जवाब को रिकॉर्ड पर लिया  है। अदालत ने केजरीवाल को बताया कि इस मामले में 4:30 बजे आज फैसला आना है। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने 13 अप्रैल को केजरीवाल की रिक्यूजल याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। चार घंटे से अधिक समय तक हुई लंबी सुनवाई में दोनों पक्षों ने तीखी बहस की, जिसमें केजरीवाल ने खुद कोर्ट में पेश होकर दलीलें रखीं थी।

इससे पहले हाईकोर्ट ने केजरीवाल की ओर से दाखिल नये हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेने का आदेश दिया था। हलफनामे में केजरीवाल ने दावा किया कि न्यायमूर्ति शर्मा के बच्चे केंद्र सरकार के एमपैनल्ड वकील हैं, जिन्हें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिये काम मिलता है। मेहता सीबीआई की ओर से पेश हो रहे हैं। ऐसे में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा तुषार मेहता के खिलाफ आदेश कैसे जारी कर पाएंगी? केजरीवाल ने कहा, यह 'डायरेक्ट कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' है, जिससे उनकी रिक्यूजल (खुद को मामले से अलग करने) की मांग और मजबूत हो गई है।

आरटीआई दस्तावेजों का हवाला देते हुए केजरीवाल ने कहा कि न्यायमूर्ति के बेटे को 2023 में 2,487, 2024 में 1,784 और 2025 में 1,633 मामले आवंटित किए गए। उन्होंने कहा कि ये तथ्य रिक्यूजल याचिका दाखिल करने के बाद उनके संज्ञान में आए। केजरीवाल ने 13 अप्रैल को भी जज पर कई आपत्तियां जताई थीं।

सीबीआई ने केजरीवाल के इस तर्क को पूरी तरह खारिज किया। सीबीआई ने अपने हलफनामे में कहा, 'केजरीवाल की इस दलील को स्वीकार किया जाए कि न्यायमूर्ति शर्मा इसलिए रिक्यूज हो जाएं, क्योंकि उनके बच्चे केंद्र सरकार की पैनल में हैं, तो देश भर के सभी जज जिनके रिश्तेदार किसी भी सरकारी पैनल पर हैं, उन्हें संबंधित सरकारों या राजनीतिक नेताओं के मामलों की सुनवाई करने से वंचित कर दिया जाएगा। इस तर्क को बढ़ा-चढ़ाकर लागू किया जाए तो सभी राज्य सरकारों, केंद्र सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से जुड़े मामलों में ऐसे सभी जज अयोग्य माने जाएंगे जिनके रिश्तेदार इनकी पैनल पर हैं।'

सीबीआई ने यह भी कहा था कि केजरीवाल की इस तर्क के आधार पर तो उन कानून अधिकारियों को भी सभी ऐसे जजों के सामने पेश होने से अयोग्य ठहरा दिया जाएगा जो पैनल वकीलों को केस आवंटित करते हैं। एजेंसी ने केजरीवाल द्वारा दायर अतिरिक्त हलफनामे को बाद का सोचा-समझा कदम करार देते हुए आरोप लगाया कि इसका मकसद अदालती संस्था और व्यक्तियों को बदनाम करना तथा दबाव बनाना है।

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