जबलपुर. हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी नाराजगी व्यक्त करते हुए एक ऐसा फैसला सुनाया है जो वर्दीधारियों की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है। मामला मंडला जिले से जुड़ा है, जहाँ पुलिस ने एक बेहद गंभीर मामले में बिना तथ्यों की जांच किए और आंखों पर पट्टी बांधकर कोर्ट में रिपोर्ट पेश कर दी। हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया, बल्कि मंडला पुलिस अधीक्षक को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को भविष्य के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने पुलिस की इस अदूरदर्शितापूर्ण रिपोर्ट पर अपनी कड़ी नाराजगी जताते हुए आवेदक को 20 अप्रैल तक अस्थाई जमानत का लाभ प्रदान कर दिया है।
घटना की शुरुआत तब हुई जब बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा काट रहे अन्नू वनवासी ने अपनी अपील के दौरान अस्थाई जमानत के लिए एक आवेदन दायर किया। याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने तर्क दिया था कि उसके बड़े भाई की शादी है, जिसके चलते उसे कुछ समय के लिए जमानत चाहिए। हाईकोर्ट ने परंपरा और कानूनी प्रक्रिया के तहत स्थानीय घुघरी थाने को मामले की सच्चाई की जांच करने और रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया। थाने से जो रिपोर्ट कोर्ट में पहुंची, उसने पूरे मामले को ही पलट दिया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि 18 अप्रैल को याचिकाकर्ता के बड़े भाई की नहीं, बल्कि स्वयं याचिकाकर्ता अन्नू वनवासी की शादी है।
अदालत ने जब इस विरोधाभासी और अविश्वसनीय रिपोर्ट को पढ़ा, तो बेंच ने पुलिस की इस मनमानी और बिना तथ्यों की जांच किए रिपोर्ट पेश करने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया। हाईकोर्ट का यह मानना था कि पुलिस ने बिना दस्तावेजों को पढ़े और बिना धरातल पर जांच किए आंखें बंद करके रिपोर्ट तैयार कर ली है, जो न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है। इस गंभीर चूक के चलते युगलपीठ ने तत्काल प्रभाव से मंडला पुलिस अधीक्षक रजत सकलेचा को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने के निर्देश दिए। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान मंडला एसपी कोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। अपनी अधीनस्थ टीम की इस भारी भूल के लिए एसपी ने बिना किसी बहाने के अदालत से क्षमा याचना की।
अदालत ने इस मामले को केवल एक व्यक्ति की जमानत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे पुलिस की कार्यशैली में सुधार का एक अवसर माना। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अरुण कुमार विश्वकर्मा ने तथ्यों को स्पष्ट किया। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस अधीक्षक को स्पष्ट शब्दों में हिदायत दी कि वे अपने मातहत कर्मचारियों को भविष्य के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी करें ताकि ऐसी गलतियां दोबारा न हों। अदालत ने कहा कि पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह जो रिपोर्ट कोर्ट में पेश करे, वह पूरी तरह से सत्य और प्रमाणित होनी चाहिए, क्योंकि न्याय की दिशा पुलिस द्वारा दी गई इन्हीं रिपोर्टों पर निर्भर करती है। यदि पुलिस ही बिना पढ़े रिपोर्ट तैयार करेगी, तो न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।
यह पूरा प्रकरण इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक लापरवाही कानून के रास्ते में बाधा बन सकती है। एक तरफ जहां पुलिस को संवेदनशील मामलों की जांच में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए, वहीं मंडला पुलिस का यह रवैया उनकी कार्यक्षमता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा गया है। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब मंडला पुलिस महकमे में भी हड़कंप मचा है और निचले स्तर के कर्मचारियों को अपनी रिपोर्ट पेश करने से पहले सौ बार सोचने की चेतावनी दी गई है। आवेदक को तो फिलहाल राहत मिल गई है, लेकिन यह मामला भविष्य में पुलिस की जांच रिपोर्टों के प्रति कोर्ट के रुख को और अधिक कठोर बनाने की दिशा में एक बड़ा संदेश दे गया है। जबलपुर हाईकोर्ट की इस फटकार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही की कोई जगह नहीं है और तथ्यों के साथ खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों को किसी भी स्तर पर माफ नहीं किया जाएगा। फिलहाल, मंडला पुलिस अब इस मामले से सबक लेने और भविष्य में अपनी रिपोर्टों की सटीकता सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य करने की बात कह रही है।