क्या है जिनपिंग का पीस प्लान?
राष्ट्रपति शी जिनपिंग का यह प्रस्ताव मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिका है, जो सीधे तौर पर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका की नीतियों को चुनौती देता नजर आता है।
साझा सुरक्षा का ढांचा: चीन का कहना है कि सुरक्षा किसी एक देश की बपौती नहीं होनी चाहिए। जिनपिंग ने 'कोल्ड वॉर मेंटेलिटी' यानी शीत युद्ध वाली मानसिकता को छोड़कर एक ऐसे सुरक्षा ढांचे की वकालत की है जो टिकाऊ हो और जिसमें सभी देशों की भागीदारी हो। चीन का मानना है कि 'जीरो-सम गेम' यानी एक का फायदा, दूसरे का नुकसान से ऊपर उठकर ही खाड़ी देशों में शांति आ सकती है। संप्रभुता का सम्मान: प्रस्ताव का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, राष्ट्रीय अखंडता। चीन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी देश की सीमाओं और उसकी सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए। हाल के दिनों में दूतावासों और बुनियादी ढांचों पर हुए हमलों की ओर इशारा करते हुए शी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और कर्मियों की सुरक्षा हर हाल में सुनिश्चित की जानी चाहिए।
मनमर्जी नहीं, कानून का राज: जिनपिंग ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लेकर पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रहार किया है। प्रस्ताव के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कानून तभी प्रभावी हैं जब उन्हें समान रूप से लागू किया जाए। उन्होंने 'जब मन किया कानून माना, जब नहीं किया तो छोड़ दिया' वाली नीति की आलोचना करते हुए संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था पर जोर दिया।
विकास ही सुरक्षा की चाबी है: चीन का मानना है कि केवल बंदूकों के दम पर शांति नहीं आ सकती। उनके चौथे बिंदू के अनुसार, सुरक्षा और आर्थिक विकास को साथ-साथ चलना होगा। चीन अपनी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (बीआरआई) के जरिए इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर एक ऐसा आर्थिक जाल बुनना चाहता है, जहां युद्ध की गुंजाइश खत्म हो जाए और व्यापारिक रिश्ते मजबूरी बन जाएं।
इसमें चीन का क्या फायदा?
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब चीन खुद को पश्चिम एशिया में एक 'शांतिदूत' के रूप में स्थापित कर चुका है। गौर करने वाली बात यह है कि अप्रैल 2026 की शुरुआत में ही पाकिस्तान की मध्यस्थता और चीन के समर्थन से अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के युद्धविराम पर सहमति बनी थी। इसी पृष्ठभूमि में जिनपिंग ने फलस्तीन के मुद्दे पर भी अपनी पुरानी मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि एक स्वतंत्र फलस्तीनी देश की स्थापना न्याय के लिए जरूरी है।
बताते चलें कि चीनी कूटनीति का यह नया चेहरा न केवल उसकी अपनी ऊर्जा सुरक्षा और तेल आयात के लिए जरूरी है, बल्कि यह दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश भी है कि अब वैश्विक फैसलों के लिए केवल अमेरिका की तरफ देखने की जरूरत नहीं है।