वनाधिकार पट्टों का अटका सफर, 2.73 लाख आदिवासियों के हक फाइलों में बंद

 Rajdra Parasar  Aug 13, 2026, 6:54 PM (2 days ago)

 वनाधिकार पट्टों का अटका सफर, 2.73 लाख आदिवासियों के हक फाइलों में बंद
केन्द्र की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, 2.44 लाख आवेदन निरस्त
भोपाल। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (एफआरए), 2006 के तहत वनाधिकार पट्टे हासिल करने की जंग लड़ रहे आदिवासियों के हक अब भी प्रशासनिक फाइलों में दबे पड़े हैं। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्यसभा में दी प्रगति रिपोर्ट ने राज्य में वनाधिकारों के निपटारे की धीमी रफ्तार पर मुहर लगा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, लंबित दावों के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है, जहां 2.73 लाख से अधिक आदिवासियों व पारंपरिक वन निवासियों के दावे अटके हुए हैं।
ज्नजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दी जानकारी के अनुसार 30 जून 2026 तक की स्थिति के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी हकीकत सामने आती है। प्रदेश में कुल प्राप्त दावों की संख्या व्यक्तिगत स्तर पर 7,66,430 और सामुदायिक स्तर पर 40,975 थी। इस तरह कुल दावों की संख्या 8,07,405 थी। इसमें से  2,44,487 आवेदनों को नियमों और दस्तावेजों की कमी या अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर अस्वीकृत कर दिया गया। वर्तमान में 2,73,457 दावे विभागों और समितियों के चक्कर काट रहे हैं और प्रक्रियाधीन हैं। प्रदेश में अब तक केवल 2,89,461 पट्टे (2,60,707 व्यक्तिगत और 28,754 सामुदायिक) ही बांटे जा सके हैं।
देश में तेलंगाना के बाद प्रदेश सबसे ऊपर
वनाधिकार कानून को लागू करने और इसकी निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, जबकि केंद्रीय मंत्रालय राज्यों से मिलने वाली रिपोर्ट को संकलित करता है। आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में वर्तमान में 10,45,970 दावे लंबित हैं और 18,13,232 आवेदन निरस्त किए जा चुके हैं। देशभर में सर्वाधिक 3,29,367 लंबित दावों के साथ तेलंगाना पहले स्थान पर है, जबकि 2,73,457 लंबित मामलों के साथ मध्यप्रदेश देश में दूसरे नंबर पर बना हुआ है।

प्रदेश में अब 24 घंटे खुलेंगे होटल, मॉल और रेस्टोरेंट
राज्यपाल ने ‘मध्यप्रदेश कार्यस्थल सशक्तिकरण संहिता 2026 को दी मंजूरी
भोपाल। प्रदेश में अब रात्रिकालीन अर्थव्यवस्था (नाइट लाइफ इकोनॉमी) और व्यापारिक गतिविधियों को एक नया मुकाम मिलने जा रहा है। प्रदेश भर के होटल, मॉल, रेस्टोरेंट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान अब हफ्ते के सातों दिन, 24 घंटे खुले रह सकेंगे।
मध्यप्रदेश विधानसभा से पारित होने के बाद राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने मध्यप्रदेश कार्यस्थल सशक्तिकरण संहिता 2026 को अपनी औपचारिक स्वीकृति दे दी है, जिसके साथ ही यह नया कानून पूरे राज्य में लागू हो गया है। इस व्यवस्था से जहां आम जनता को देर रात तक खरीदारी और मनोरंजन की सुविधा मिलेगी, वहीं युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। हालांकि, शराब दुकानों की समय-सीमा पर अंतिम फैसला स्थानीय प्रशासन ही करेगा।
सरकार ने नए अधिनियम के तहत व्यापार शुरू करने की जटिलताओं को खत्म कर दिया है। संस्थानों को अब केवल नियमानुसार विभाग को सूचना देनी होगी, जिसके आधार पर तुरंत सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाएगा। व्यवसायियों को बार-बार रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराने की परेशानी से मुक्ति मिलेगी। संस्थान बंद करने की स्थिति में लिखित सूचना देने पर रजिस्ट्रेशन निरस्त कर दिया जाएगा।
कर्मचारियों के अधिकारों और सुरक्षा के कड़े नियम
व्यापारिक प्रतिष्ठानों को 24 घंटे खोलने की छूट के साथ ही कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए सख्त दिशानिर्देश लागू किए गए हैं। संस्थानों को अलग-अलग शिफ्टों में कर्मचारियों की तैनाती करनी होगी और श्रम विभाग द्वारा तय न्यूनतम कार्य-घंटों के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। अक्सर देखने में आता था कि नियोक्ता कर्मचारियों को बांधकर रखने के लिए उनके ओरिजनल डॉक्युमेंट्स रख लेते थे। नए कानून में इस पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
शिकायत निवारण और पारदर्शी जांच
कर्मचारियों की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए विशेष समितियों का गठन किया जाएगा। कर्मचारी अपनी शिकायतें इन समितियों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष दर्ज करा सकेंगे। इसके अलावा, श्रम विभाग को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी संस्थान की औचक जांच कर सकता है और दस्तावेज मांग सकता है। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
 
भाजपा की युवा नीति के जवाब में कांग्रेस का छात्र राजनीति कार्ड
प्रदेश में सत्ता और विपक्ष दोनों की नजरें युवा वोट बैंक पर
भोपाल। प्रदेश में 2028 के विधानसभा आम चुनावों से ठीक पहले वर्ष 2027 में होने जा रहे नगरीय निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दशा और दिशा तय करेंगे। इस बार महापौर, नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से (जनता द्वारा सीधे) होने हैं। दतिया उपचुनाव के नतीजों और बदलते राजनीतिक रुझानों के बीच सत्ताधारी भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ही दलों का पूरा फोकस राज्य के युवा वर्ग पर टिक गया है।
एक तरफ भाजपा निकाय चुनावों के जरिए संगठन में बड़े पीढ़ी परिवर्तन की बिसात बिछा रही है, वहीं कांग्रेस इसके काट के रूप में छात्र राजनीति और प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनावों का कार्ड खेल रही है। दतिया उपचुनाव के नतीजों से सबक लेते हुए भाजपा अब जमीनी स्तर पर बिना किसी अचानक उथल-पुथल के धीरे-धीरे पीढ़ी परिवर्तन का प्रयोग करने जा रही है। 2027 के निकाय चुनावों को 2028 का सेमीफाइनल मानकर चल रही भाजपा की योजना है कि निकाय स्तर पर नया और युवा नेतृत्व उभारा जाए। पार्टी सूत्रों के अनुसार, महापौर और अध्यक्ष पदों के लिए 60 वर्ष से कम उम्र के नेताओं को तरजीह दी जाएगी, जबकि पार्षद पद के लिए लगभग 40 वर्ष की आयु सीमा तय करने पर विचार चल रहा है।
साफ छवि वालों को मिलेगा मौका
सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने के लिए समाज में सक्रिय और स्वच्छ छवि वाले युवाओं को आगे किया जाएगा, भले ही वे संगठन में किसी बड़े पद पर न हों। निकाय चुनाव में खुद को साबित करने वाले युवाओं के बाद 2028 के विधानसभा चुनाव में केवल उन्हीं वरिष्ठ नेताओं को टिकट दिया जाएगा, जो स्वयं आसानी से चुनाव जीतने के साथ आसपास के क्षेत्रों में भी प्रभाव रखते हों।
कैंपस पॉलिटिक्स और जन-मुद्दों से भाजपा की काट
दूसरी ओर, भाजपा की रणनीतिक तैयारी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस ने छात्र और युवा राजनीति को अपना मुख्य हथियार बनाया है। हाल ही में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में आयोजित पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की बैठक के बाद से ही पार्टी ने युवाओं, किसानों और महिलाओं के मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया है। कांग्रेस की सबसे बड़ी रणनीति प्रदेश में छात्र संघ चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराने की है। पार्टी का मानना है कि यदि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सीधे चुनाव होते हैं, तो युवाओं के बीच नई राजनीतिक खेप तैयार होगी जो सीधे भाजपा को चुनौती देगी। छात्र संघ चुनावों की बहाली, बेरोजगारी और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर कांग्रेस बड़े स्तर पर सड़क पर उतरने की तैयारी कर रही है।
2028 की राह तय करेगा 2027 का परिणाम
नगरीय विकास विभाग द्वारा वार्डों का पुनरीक्षण पूरा हो चुका है और मतदाता सूची भी प्रकाशित की जा चुकी है। अब प्रत्यक्ष प्रणाली से होने जा रहे इन चुनावों के लिए दोनों ही दलों को रणनीति बनाने का पूरा समय मिल गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि निकाय चुनावों के साथ-साथ प्रत्यक्ष छात्र संघ चुनाव का माहौल बनता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में युवा मतदाता और युवा नेतृत्व ही हार-जीत की सबसे बड़ी कुंजी साबित होंगे।
 
आवासीय क्षेत्रों में सीलिंग से उपजा संकट, मास्टर प्लान लागू करने की मांग
कांग्रेस ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, स्थायी शहरी नीति बनाने की मांग
भोपाल। राजधानी के आवासीय क्षेत्रों में संचालित व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ नगर निगम की सीलिंग कार्रवाई और करीब 1,800 नोटिस जारी होने के बाद शहर का व्यापारिक माहौल गर्मा गया है। इसे केवल व्यापारियों या रहवासियों की गलती मानने के बजाय सरकारी एजेंसियों की विफलता करार देते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
पटवारी ने कहा कि वर्षों से कर, लाइसेंस और सरकारी अनुमतियों के तहत चल रही दुकानों और कार्यालयों पर एकतरफा कार्रवाई से हजारों परिवारों की आजीविका खतरे में आ गई है। शहर में वर्ष 2005 का पुराना मास्टर प्लान ही प्रभावी है, जबकि भोपाल विकास योजना-2031 का ड्राफ्ट फरवरी 2024 में वापस लिए जाने के बाद से अटका पड़ा है। दो दशकों में शहर के ट्रैफिक, आबादी और व्यापार में भारी बदलाव आ चुका है, ऐसे में पुराने भू-उपयोग मानचित्र के आधार पर सीलिंग करना व्यावहारिक नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि भोपाल के बाद इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे प्रमुख शहरों में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने भोपाल को रहवासी बनाम व्यापारी के टकराव में धकेलने के बजाय पारदर्शी नीति, जनसुनवाई और एकीकृत डिजिटल प्लानिंग के माध्यम से संतुलित कानूनी समाधान निकालने का आग्रह किया।
कांग्रेस ने दिए सुझाव
भोपाल विकास योजना-2031 का संशोधित ड्राफ्ट तत्काल सार्वजनिक कर समयसीमा तय की जाए। शहर का वैज्ञानिक आकलन कर लंबे समय से संचालित कारोबारों के लिए नियमितीकरण व मिश्रित भू-उपयोग की स्पष्ट नीति बने। प्रभावित छोटे कारोबारियों के लिए किफायती व्यावसायिक स्थान विकसित किए जाएं। 2005 से 2031 के मास्टर प्लान में हुई देरी और ड्राफ्ट लौटाए जाने के कारणों पर श्वेत-पत्र लाया जाए।
 
शिवराज, तोमर, वीडी के बाद खंडेलवाल भी दिल्ली दरबार में
भोपाल। दतिया उपचुनाव में मिली शिकस्त के बाद प्रदेश भाजपा के भीतर सियासी तपिश अचानक बढ़ गई है। हार के घाव और संगठन के अंदर उठते भीतरघात के सुरों के बीच अचानक शुरू हुआ दिल्ली दौड़ का सिलसिला प्रदेश की राजनीति में बड़े फेरबदल के संकेत दे रहा है।
उपचुनाव के नतीजे आते ही दिल्ली में बैठकों का दौर तेज हो गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा की। इसके बाद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद वीडी शर्मा ने भी शीर्ष नेतृत्व से भेंट की। वहीं हाल ही में विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने प्रधानमंत्री से अलग से मुलाकात की। इसी कड़ी में अब आज गुरूवार को नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी दिल्ली पहुंचे और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से सौजन्य भेंट की। हालांकि, पार्टी सूत्रों और प्रदेश नेतृत्व ने इन मुलाकातों को केवल संगठनात्मक विषयों और भावी कार्ययोजनाओं पर सार्थक चर्चा तथा शिष्टाचार भेंट करार दिया है। लेकिन जिस समय और परिस्थिति में यह सियासी हलचल तेज हुई है, उसने राजनीतिक गलियारों में अटकलों को हवा दे दी है।
गौरतलब है कि दतिया उपचुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद संगठन स्तर पर कार्यकर्ताओं की भूमिका, चुनावी प्रबंधन की कमियों और अंदरूनी खींचतान को लेकर फीडबैक जुटाया जा रहा है। माना जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व इस हार को हल्के में लेने के मूड में नहीं है और जल्द ही संगठन में कसावट लाने के लिए सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। 

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