अपनी पहचान की तलाश में आदिवासी समुदाय

 

प्रदेश में उठी अलग धर्म कोड की मांग
भोपाल। प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक बार फिर आदिवासी धर्म कोड की मांग ने जोर पकड़ लिया है। प्रदेश के विभिन्न आदिवासी संगठनों और प्रमुख नेताओं का तर्क है कि आदिवासियों की परंपराएं, पूजा पद्धति और संस्कृति मुख्यधारा के धर्मों से पूर्णतः भिन्न हैं। जनगणना में अपनी विशिष्ट पहचान खोने के डर से अब यह मांग एक जनांदोलन का रूप ले रही है।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि अपना खोया हुआ हक वापस पाने की लड़ाई है। वे इसे लेकर इतिहास बताते हुए तर्क देते है कि 1871 से 1951 तक की जनगणना में आदिवासियों के लिए एक अलग श्रेणी निर्धारित थी। 1951 के बाद इस श्रेणी को हटा दिया गया, जिसके बाद आदिवासियों को हिंदू, ईसाई या इस्लाम जैसी श्रेणियों में शामिल होने पर मजबूर होना पड़ा। संगठनों का तर्क है कि इससे उनकी वास्तविक जनसंख्या और सांस्कृतिक स्वायत्तता के आंकड़े प्रभावित हो रहे हैं। आदिवासी संगठनों की मांग है कि केंद्र सरकार आगामी जनगणना में आदिवासी धर्म कोडया सरना कोड को शामिल करे। झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के बाद अब मध्यप्रदेश में इस मांग का उठना केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर करोड़ों लोगों की धार्मिक और सामाजिक पहचान से जुड़ा विषय है।
सरना धर्म और प्रकृति पूजा
आदिवासी एकता परिषद के पदाधिकारियों का कहना है कि इस मांग का केंद्र सरना’ धर्म कोड है। आदिवासी समुदाय का मानना है कि वे मूर्ति पूजा के बजाय जल, जंगल और जमीन (प्रकृति) के उपासक हैं। हमारी आस्था पेड़ों, पहाड़ों और पुरखों में है। हमें किसी दूसरे धर्म के साथ जोड़ना हमारी मौलिक पहचान को मिटाने जैसा है।
बढ़ता राजनीतिक समर्थन
मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी इस मांग को मुखरता से उठाया है। उनका कहना है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं और उनकी विशिष्ट आस्था के लिए जनगणना में अलग कॉलम होना अनिवार्य है। आदिवासी एकता परिषद जैसे संगठन सांस्कृतिक एकता महासम्मेलनों के जरिए गांव-गांव जाकर इस मुद्दे पर जनजागरूकता फैला रहे हैं।


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