वंदे मातरम् के संगीत का इतिहास

आज देश जब वंदेमातरम् की 150वी जयंती मना रहा है, युवा पीढ़ी को वंदेमातरम् के संगीत में जानकारी होना चाहिए। राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के संगीत का दिलचस्प इतिहास है। 'वंदे मातरम्' को संगीतबद्ध करना संगीतकारों के लिए गर्व की बात तो थी ही, लेकिन यह राष्ट्र धर्म का एक अत्यंत चुनौतिपूर्ण कार्य भी था। संस्कृतनिष्ठ शब्दों की लयकारी करना और उसे सामूहिक गान के लिए उपयुक्त बनाना विलक्षण सांगीतिक प्रतिभा के सामर्थ्य की ही बात थी। इस गीत को भारतीय शास्त्रीय संगीत के मनीषियों ने अपनी प्रतिभा के पुष्प अर्पित किये हैं।

'वंदे मातरम्' की पहली धुन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बनाई और राष्ट्रीय कांग्रेस के बारहवें अधिवेशन में स्वयं प्रस्तुत की। 1904 ईसवी में रवीन्द्रनाथ टैगोर की आवाज में 'वंदे मातरम्' का पहला ग्रामोफोन रेकार्ड बाजार में आया। इस बीच स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन तेज हो गया था। फ्रांस की रिकॉर्ड कंपनी 'पाथे' ने इसे प्रकाशित किया। यह एक पैंटोग्राफ जैसा रिकॉर्ड था। 1901 ईसवी में दक्षिणराजन सेन ने स्वयं का संगीतबद्ध 'वंदे मातरम्' गाया। इसको संगीतबद्ध करने में सबसे प्रमुख नाम पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का है जिन्होंने लाहौर से इसकी सार्वजनिक प्रस्तुति शुरू की और देश भक्तों के बीच विभिन्न स्थानों पर गाते रहे। उनके संगीतबद्ध किये हुए 'वंदे मातरम्' की विशेषता यह थी कि उन्होंने इसकी मूल प्रेरणा और शब्दों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए संगीत दिया।

एक अन्य संगीतकार दिलीप कुमार राय ने 'वंदे मातरम्' की नई संगीत रचना तैयार की और उसे महात्मा गांधी की उपस्थिति में 29 अगस्त 1927 को प्रस्तुत किया। गांधी जी ने उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उनके दो रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। उन्होंने अपनी आवाज में जो 'वंदे मातरम्' गाया वह असम की लोक गीत शैली में है। दूसरा रिकॉर्ड कर्नाटक संगीतकार स्वर्गीय एम.एस. सुब्बलक्ष्मी के साथ गाया था। यह संगीत रचना राग बिलावल और राग बागेश्री का समन्वय है। 'वंदे मातरम्' के संगीत से जुड़ा एक अन्य नाम मास्टर कृष्णराव का है। उन्होंने अकेले ही इसकी प्रस्तुतियाँ देना शुरू की थीं और इसको राष्ट्रगीत का दर्जा दिलाने के लिए प्रयत्नशील रहे। पूना में जन्में मास्टर कृष्णराव एक गायक अभिनेता थे। उन्होंने राग झिंझौटी में 'वंदे मातरम्' तैयार किया जो सार्वजनिक गायन के लिए उपयोगी था। पण्डित पलुस्कर ने'वंदे मातरम्' को राग काफी में प्रस्तुत किया। इसी राग में निबद्ध पं. ओंकारनाथ ठाकुर का गाया 'वंदे मातरम्' खूब सराहा गया। उन्होंने संपूर्ण गीत गाया। बाद में जब 1947 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने स्वतंत्रता दिवस की सुबह आकाशवाणी पर 'वंदे मातरम्' गाने के लिए आमंत्रित किया तो ओंकारनाथ ठाकुर ने सावधान की मुद्रा में पूरा 'वंदे मातरम्' गाया। 1935 से 1952 ईसवी के बीच कई विख्यात संगीतकारों ने 'वंदे मातरम्' को संगीत दिया। उनमें से प्रमुख मराठी रंगमंच के अभिनेता केशव राव भोले, विष्णुपंत फगणीस, वी.डी. अभ्यंकर, मास्टर कृष्णराव और दिलीप कुमार राय प्रमुख हैं। विष्णुपंत फगणीस ने 'वंदे मातरम्' को राग सारंग में प्रस्तुत किया। उस सभा में गोविंद वल्लभ पंत, डॉ. पट्टाभि सीतारमैया, दादा धर्माधिकारी भी उपस्थित थे। इसके बाद मोगूबाई कुर्डीकर ने राग मिश्र खंबावती में इसे गाया। बाद के समय में तिमिरबरन भट्टाचार्य ने राग दुर्गा में 'वंदे मातरम्' की संगीत रचना की जो ब्रिटिश बैंड पर भी बजाया गया। राग दुर्गा की धुन मार्च पास्ट में बजने वाले गीत की तरह है। राग दुर्गा की धुन को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से प्रसारित करवाया जब उन्होंने आजाद हिन्द फौज की स्थापना की थी। 'वंदे मातरम्' की एक लोकप्रिय धुन हेमन्त कुमार ने बनाई। इसके संगीत से जुड़े प्रसंगों को मास्टर कृष्ण राव ने विभिन्न अवसरों पर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेताओं के समक्ष रखा। वे एक नई लोकप्रिय धुन एआर रहमान से बनाई है। उन्होंने 17 जनवरी 1950 को एक पत्रकार वार्ता में 'वंदे मातरम्' की तीन संगीत रचनाएँ भी प्रस्तुत की थी। हमारे समय के संगीतकार भी 'वन्दे मातरम्' की नयी-नयी धुनें बना रहे हैं।

देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जन-जन को जोड़ने में 'वंदे मातरम्' की विशेष भूमिका थी। लोगों में देशप्रेम और आजादी पाने की अभिलाषा बढ़ाने वाली इस रचना का ही प्रभाव था जब भारत के कोने-कोने से अंग्रेजों को वापिस अपने देश जाने के लिए आवाजें तेज होती गई। इस गीत ने नागरिकों के स्वाभिमान को जगाकर संगठित रूप से राष्ट्र के सम्मान को कायम रखने के लिए जुनून पैदा किया।

भारतीय गणतंत्र की स्थापना के लिए 26 जनवरी, 1950 की तिथि निर्धारित की गयी थी। राष्ट्रपति के निर्वाचन के पहले राष्ट्रगान का चयन होना था। 'वंदे मातरम्' के संबंध में यह आपत्ति उठाई गई थी कि 'जन-गण-मन' के मुकाबले वह बैंड संगीत के लिए उपयुक्त नहीं था।

राष्ट्रगान की धुन के संबंध में यह महसूस किया गया है कि उसमें शब्दों से ज्यादा धुन का महत्व होता है, और इस धुन को न केवल भारतीय संगीत की खूबी का प्रतिनिधित्व करना चाहिए बल्कि कुछ हद तक पश्चिमी संगीत के लिए भी सुविधाजनक होना चाहिए जिससे उसे आर्केस्ट्रा तथा बैंड पर विदेशों में भी आसानी से प्रस्तुत किया जा सके। पुराना अनुभव बताता है कि 'जन गण मन' की धुन ने विदेशों में ज्यादा प्रशंसा पायी है तथा उसे पसंद किया गया है। 'वंदे मातरम्' उसके प्रति महान आकर्षण तथा उसको ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद विदेशों में आर्केस्ट्रा पर बजाने में ज्यादा सुविधाजनक नहीं है। इस कारण 'वंदे मातरम्' भारत का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगीत रहेगा तथा राष्ट्रगान की धुन जन-गण-मन की रहेगी और 'जन-गण-मन' के शब्दों में आवश्यकतानुसार संशोधन किया जाएगा।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अध्यक्षता करते हुए यह बयान दिया जो इस विषय पर अंतिम निर्णय माना जाता है :-

'जन-गण-मन' गीत तथा उसका संगीत भारत का राष्ट्रगान है। भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में ऐतिहासिक योगदान देने वाले गीत 'वंदे मातरम्' को 'जन-गण-मन' के बराबर सम्मान रहेगा और उसे बराबरी का दर्जा प्राप्त रहेगा।

शासकीय कार्यालयों में राष्ट्रगीत

संसद तथा विधानसभा में 'वंदे मातरम्' का गायन किया जाता है। इसे चरणबद्ध रूप से लागू किया जाय। कार्यालयों में 'वंदे मातरम्' के पहले दो छंद ही गाये जायेंगे। इसकी शुरूआत पहले मंत्रालय तथा जिलाध्यक्ष कार्यालयों से हो गई है। 'वंदे मातरम्' के गरिमापूर्ण गायन को सुनिश्चित करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जायेंगे।

शासकीय कार्यालयों में 'वंदेमातरम्' के गायन का उद्देश्य शासकीय कर्मियों में राष्ट्रभक्ति तथा राष्ट्र सेवा की भावना जगाना है। इससे अनुशासन भी आएगा और शासकीय कर्मियों को समय पर कार्यालय पहुँचने की प्रेरणा भी मिलेगी।

(साभार मध्यप्रदेश संदेश जुलाई 2026)

                                                                                        अवनीश सोमकुवर


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