By-Election: बांकीपुर में दोहराया गया 59 साल पुराना इतिहास, दो 'जायंट किलर्स' की कहानी में एक जैसे कई संयोग

Jai Dev SinghUpdated Mon, 03 Aug 2026 06:48 PM IST

जनसुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की है। उनकी यह जीत इस लिहाज से अहम है कि बांकीपुर में बीते 31 साल से लगातार भाजपा का ही कब्जा था। यानी प्रशांत किशोर ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगाई है। हालांकि, इसी सीट पर 59 साल पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ था। तब जिस पार्टी के गढ़ में सेंध लगी थी, वह थी कांग्रेस और जिस नेता को हार मिली थी, वह थे मुख्यमंत्री केबी सहाय।

Bankipur Bypoll: Prashant Kishor Revives 59-Year-Old Giant Killer Legacy of Mahamaya Prasad Sinha History

बांकीपुर में भाजपा के गढ़ में लगी सेंध। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है। कुछ ऐसा ही इतिहास बांकीपुर में भी दोहराया गया है। प्रशांत किशोर की जीत ने 59 साल पुरानी कहानी फिर याद दिला दी है। जब बांकीपुर यानी उस वक्त की पटना पश्चिम विधानसभा सीट के नतीजे आए थे। उन नतीजों ने बिहार की सियासत को पूरी तरह बदल दिया था। उस चुनाव में एक 'जायंट किलर' ने पटना पश्चिम सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री को मात दी थी। अब एक 'जायंट किलर' ने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के गढ़ में सेंध मारी है। 

59 साल पुरानी उस कहानी में और इस बार की कहानी में कई चीजें एक सी हैं। कुछ अलग भी हैं पर पहले बात एक सी बातों की। दोनों ही कहानियों में एक नेता होता है, दोनों कहानियों का मुख्य किरदार अपनी पार्टी छोड़कर एक नई पार्टी का बनाता है। दोनों ही कहानियों में नेता छात्रों के लिए सड़क पर उतरता है। दोनों कहानियों में नेता बांकीपुर यानी पहले की पटना पश्चिम सीट से चुनाव में उतरता है और एक गढ़ को ढहा देता है। पहली कहानी का नायक कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाता है तो दूसरी कहानी का नायक भाजपा का गढ़ बन चुकी उसी सीट पर सेंधमारी करता है। पहली कहानी के नायक थे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा और नई कहानी के नायक हैं प्रशांत किशोर। आइये जानते दोनों की कहानियों में शामिल इन संयोगों का पूरा किस्सा....

Bankipur Bypoll: Prashant Kishor Revives 59-Year-Old Giant Killer Legacy of Mahamaya Prasad Sinha History

बिहार के मुख्यमंत्री रहे महामाया प्रसाद सिन्हा। - फोटो : अमर उजाला

पहले बात पहली कहानी की...

ये किस्सा है साल 1967 का, जब महामाया प्रसाद सिन्हा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय के खिलाफ पटना पश्चिम सीट से चुनाव लड़ने लड़ा और उन्होंने सीएम सहाय को 20 हजार वोटों के अंतर से पटखनी दे दी। इस जीत के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा राज्य की पहली गैर कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री भी बने। और राज्य में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। हालांकि, एक साल के भीतर ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 1967 की जीत के पहले की कई घटनाएं जो इस कहानी की वजह हैं। 

मुख्यमंत्री बनने के चंद महीने पहले तक महामाया प्रसाद कांग्रेस में ही थे। इस दौरान उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ हो रहे छात्र आंदोलन में उतर गए थे।  ये वो दौर था जब कांग्रेस में अंतर्कलह चरम पर था। लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक में मुख्यमंत्री केबी सहाय पर टिकट बंटवारे में भेदभाव के आरोप लगे। इससे नाराज होकर कांग्रेस के कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए। दूसरी तरफ बिहार में 1965 और 1966 में मानसून में कमी भी देखी गई और इस दौरान केंद्र की कांग्रेस की सरकार की तरफ से मदद भी उचित मात्रा में नहीं पहुंची। इससे जनता में जबरदस्त रोष उभरा। 
 
हालांकि, बिहार से कांग्रेस के जाने की सबसे बड़ी वजह बना एक छात्र आंदोलन, इस दौरान गोली चलने की घटना की वजह से कृष्ण बल्लभ सहाय के खिलाफ आक्रोश चरम पर था।  1967 में केबी सहाय सरकार के खिलाफ छात्रों का गुस्सा भड़का तो महामाया प्रसाद सिन्हा छात्रों के साथ आंदोलन में जुट गए। उन्होंने कांग्रेस से राहें अलग कर लीं और राजा कामाख्या नारायण सिंह के साथ जन क्रांति दल की स्थापना की। इतना ही नहीं छात्र आंदोलन के बाद इस बार उन्होंने सीधा तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय के खिलाफ पटना पश्चिम सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। उन्होंने सीएम सहाय को 20 हजार वोटों के अंतर से पटखनी दी।  


अब बात प्रशांत किशोर की कहानी की...

चुनाव रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में जीत दर्ज की है। इस सीट पर 31 साल से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के परिवार का कब्जा था। पहले उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा 1995 से लगातार चार बार जीते। इसके बाद 2006 में नितिन नवीन पटना पश्चिम सीट पर जीते। 2010 में बांकीपुर के अस्तित्व में आने के बाद नितिन नवीन लगातार चार बार 2010, 2015, 2020 और 2025 में जीते। अब प्रशांत किशोर ने इस गढ़ में सेंध लगाई है। प्रशांत किशोर  16 सितंबर 2018 को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) में शामिल हुए थे। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 

Bankipur Bypoll: Prashant Kishor Revives 59-Year-Old Giant Killer Legacy of Mahamaya Prasad Sinha History

प्रशांत किशोर। - फोटो : अमर उजाला
2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के मुद्दे पर नीतीश कुमार से उनके मतभेद हुए। इसके बाद उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। 2 अक्तूबर 2024 को उन्होंने जन सुराज पार्टी (जेएसपी) की स्थापना की। पार्टी की स्थापना के महज तीन महीने बाद छात्रों के मुद्दे पर पटना की सड़क पर उतरे। दरअसल कथित पेपर लीक और भारी अनियमितताओं का आरोप लगाकर पटना में छात्र सड़कों पर थे। छात्र पूरी परीक्षा को रद्द करके दोबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग कर रहे थे। इन छात्रों के समर्थन में प्रशांत किशोर ने 2 जनवरी 2025 से पटना के गांधी मैदान में अनशन शुरू कर दिया, जो कि उसी बांकीपुर सीट के अंतर्गत आता है, जहां इस बार प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज की है। कुछ दिन बाद उनकी तबियत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

आखिरकार 14वें दिन उन्होंने अपना अनशन तोड़ दिया। प्रशांत किशोर लगातार छात्रों, युवाओं के मुद्दे उठा रहे हैं। 10 महीने पहले उनकी पार्टी की भले उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली हो, पर उनकी इस जीत ने प्रशांत किशोर की सियासत को नई उम्मीद दे दी है। साथ ही एक बार फिर बांकीपुर ने एक गढ़ को ढहते हुए देखा है।

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