संसद के विशेष सत्र पर क्यों मची रार?: आरक्षण नहीं, परिसीमन विधेयक पर विपक्ष कर रहा विरोध, जानें और क्या विवाद

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 15 Apr 2026 08:46 PM IST
 

केंद्र सरकार लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने और इसके आधार पर महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए संसद के विशेष सत्र में प्रस्ताव रखने वाली है। विधेयक के ड्राफ्ट के अनुसार, नए स्वरूप में राज्यों के लिए 815 सीटें और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें निर्धारित की गई हैं। 

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नारी शक्ति वंदन अधिनियम से बदलेगी संसद की संरचना। - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र 16 अप्रैल 2026 (गुरुवार) से शुरू हो रहा है। केंद्र सरकार इस सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए विधेयक पेश करने वाली है। केंद्र सरकार इसे महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में आरक्षण बढ़ाने के लिए जरूरी कदम बताया है। इस विशेष सत्र में सिर्फ महिलाओं का आरक्षण बढ़ाने के लिए ही विधेयक नहीं पेश होगा। इसके अलावा सरकार दो और विधेयक पेश करेगी। इसमें एक विधेयक मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बढ़ाने के लिए होगा, जबकि एक और विधेयक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू करने और उनमें सीट बढ़ाने का प्रस्ताव होगा। 

सदन में कौन-कौन से विधेयक पेश करेगी सरकार?

1. संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: यह विधेयक लोकसभा सदस्यों की क्षमता को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 तक करने का प्रस्ताव करता है, जिसमें से 815 सदस्य राज्यों से और 35 सदस्य केंद्र शासित प्रदेशों से चुने जाएंगे। इसके तहत संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में संशोधन किया जाएगा, ताकि 2026 के बाद की जनगणना का इंतजार किए बिना नवीनतम उपलब्ध जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जा सके। इसका मुख्य उद्देश्य 2029 के चुनावों से पहले लोकसभा और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण को तत्काल प्रभाव से लागू करना है।
2. परिसीमन विधेयक, 2026: यह विधेयक पुराने परिसीमन अधिनियम, 2002 को निरस्त करके उसकी जगह लेगा। इस विधेयक के तहत एक नए परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान है। यह आयोग नवीनतम जनगणना (2011) के आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करेगा। 
3. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: यह एक सक्षम विधेयक (Enabling Bill) है, जो राज्यों के अलावा दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुदुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने का रास्ता साफ करेगा। ये तीनों विधेयक मुख्य रूप से महिला आरक्षण को जल्द लागू करने और देश के चुनावी ढांचे में व्यापक बदलाव (परिसीमन) करने के लिए लाए जा रहे हैं।

अब जानें- विधेयकों के जरिए कैसे बढ़ जाएंगी लोकसभा सीटें?

चूंकि, महिला आरक्षण को लागू करने के लिए पहले सीटों को बढ़ाए जाने का प्रावधान किया गया है, इसलिए सरकार संविधान (131वां संशोधन) ला रही है, ताकि लोकसभा की सीटों को बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 में संशोधन किया जा सके।
लोकसभा में संख्याबल बढ़ेगा: संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन किया जाएगा। इसके तहत लोकसभा की वर्तमान क्षमता (543 सदस्य) को बढ़ाकर अधिकतम 850 सदस्य कर दिया जाएगा। नई व्यवस्था में राज्यों से ज्यादा से ज्यादा 815 प्रतिनिधि चुने जाएंगे, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों से अधिकतम 35 सदस्य लोकसभा पहुंचेंगे। सीटों की संख्या बढ़ने से तकनीकी रूप से हर निर्वाचन क्षेत्र का भौगोलिक आकार छोटा हो जाएगा। इन 850 सीटों में से 33 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यानी 2029 के लोकसभा चुनाव से करीब 280 सीटों पर सिर्फ महिला उम्मीदवार ही आरक्षण के तहत चुनाव लड़ सकेंगी। 

सरकार के 2023 वाले महिला आरक्षण विधेयक का क्या हुआ?

सितंबर 2023 में संसद की तरफ से जिस नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन अधिनियम) सफलतापूर्वक पारित कर दिया गया था, उसमें पहले ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, इसके लागू होने में एक बड़ी तकनीकी बाधा आ रही थी। दरअसल, 2023 के कानून की शर्तों के अनुसार, महिला आरक्षण को उस परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही लागू किया जा सकता था, जो 2023 के बाद होने वाली पहली जनगणना पर आधारित हो। अब चूंकि जनगणना की प्रक्रिया में देरी हुई है, इसलिए 2023 वाले कानून के तहत महिला आरक्षण 2034 से पहले लागू होना मुश्किल था।

इसी अड़चन को दूर करने के लिए सरकार अब विशेष सत्र में नए विधेयक ला रही है, ताकि 2023 के कानून में आवश्यक बदलाव किए जा सकें। सरकार का मकसद है कि 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जमीनी स्तर पर लागू किया जा सके।

महिला आरक्षण के लिए लाया गया नया विधेयक पुराने से कितना अलग?

महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लाया गया नया विधेयक (संविधान 131वां संशोधन विधेयक, 2026) सितंबर 2023 में पारित पुराने कानून (106वां संविधान संशोधन या नारी शक्ति वंदन अधिनियम) की तुलना में कई बुनियादी और तकनीकी बदलाव करता है। 

1. लागू होने की समय-सीमा

पुराना कानून: 2023 के कानून के अनुसार, महिला आरक्षण 2023 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू हो सकता था। इस बाध्यता के कारण यह आरक्षण 2034 से पहले लागू होता हुआ नहीं दिख रहा था।
नया विधेयक: इसका मुख्य लक्ष्य इस देरी को खत्म करना है ताकि 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जमीनी स्तर पर पूरी तरह से लागू किया जा सके।

2. जनगणना की शर्त 

पुराना कानून: इसके तहत परिसीमन के लिए भविष्य की नई जनगणना यानी अभी चल रही 2027 की जनगणना के पूरे होने का इंतजार करना अनिवार्य था।
नया विधेयक: यह भविष्य की जनगणना के इंतजार को खत्म कर देता है। नए प्रस्ताव के अनुसार अब परिसीमन नवीनतम प्रकाशित जनगणना यानी 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही किया जाएगा। 

3. संवैधानिक अनुच्छेदों में बदलाव

पुराना कानून: यह केवल परिसीमन पूरा होने पर आरक्षण लागू करने की शर्त लगाता था।

नया विधेयक: यह संविधान के अनुच्छेद 334ए में संशोधन करता है, ताकि परिसीमन पूरा होते ही महिलाओं को तुरंत आरक्षण मिल सके। इसके अलावा, यह अनुच्छेद 81 और 82 में भी संशोधन करता है, जिससे 2026 के बाद की जनगणना तक परिसीमन पर लगी पुरानी रोक हट जाती है। यह संसद को साधारण कानून बनाकर परिसीमन के लिए जनगणना के आंकड़े (जैसे 2011) तय करने का अधिकार देता है।

4. रोटेशन और आरक्षण की अवधि

नए ड्राफ्ट में स्पष्ट प्रावधान है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) की महिलाओं सहित, यह 33% आरक्षित सीटें अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर बांटी जाएंगी। यह आरक्षण कानून के लागू होने से 15 साल की अवधि तक लागू रहेगा, जिसके बाद संसद चाहे तो इस अवधि को बढ़ा सकती है।

जब सरकार महिलाओं को जल्द आरक्षण देना चाहती है तो इस पर विवाद क्यों?

सरकार महिला आरक्षण को 2029 के चुनावों से पहले लागू करना चाहती है। केंद्र का कहना है कि तीन नए विधेयकों के जरिए वह महिलाओं को जल्द से जल्द संसद और राज्यों की विधानसभाओं में ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व दिलाने के पक्ष में है। हालांकि, विपक्ष और आलोचकों का मुख्य विवाद आरक्षण पर नहीं, बल्कि इसे लागू करने के लिए अपनाई जा रही परिसीमन की नई प्रक्रिया पर है। इसके अलावा महिला आरक्षण को लागू करने के लिए संविधान में किए जा रहे संरचनात्मक बदलावों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि महिला आरक्षण की आड़ में देश के चुनावी ढांचे को सत्ताधारी दल के पक्ष में मोड़ा जा रहा है। आइये जानते हैं कि तीन नए विधेयकों पर विवाद क्या है...

1. 'जनसंख्या' की नई परिभाषा (अनुच्छेद 81 में संशोधन)

प्रस्तावित बदलाव: पहले संविधान के तहत परिसीमन के लिए 'अंतिम प्रकाशित जनगणना' का इस्तेमाल करना अनिवार्य था। पर अब नए विधेयक के  तहत  'जनसंख्या' का मतलब वह होगा जिसे संसद कानून द्वारा निर्धारित करे। यानी यह पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र में होगा कि वह किस जनसंख्या के आधार पर परिसीमन कराना चाहती है।  नए विधेयक में कहा गया है कि परिसीमन के लिए आयोग का गठन सिर्फ तब ही होगा, जब संसद इसे लेकर कानून पारित करेगा। 
विवाद क्यों: यह बदलाव परिसीमन की प्रक्रिया को सांविधानिक नियम-आधारित प्रणाली से हटाकर सत्ताधारी दल के विवेक पर छोड़ देता है। विपक्ष का तर्क है कि इससे सरकार को यह चुनने की मनमानी शक्ति मिल जाएगी कि किस दशक की जनगणना के आंकड़े उनके राजनीतिक फायदे के लिए सबसे बेहतर हैं। इससे अंतिम प्रकाशित जनगणना को आधार मानने की अनिवार्यता भी खत्म हो जाएगी। इसके अलावा सत्तासीन दलों के पास यह अधिकार होगा कि वह कब और किस स्थिति में परिसीमन कराना चाहती हैं। वह परिसीमन न कराने के लिए संविधान के मौजूदा नियम- 10 साल में परिसीमन के लिए बाध्य नहीं होंगी। इसकी अनिवार्यता सिर्फ संसद में कानून पारित होने के बाद ही होगी। 

2. परिसीमन को जनगणना से अलग करना (अनुच्छेद 82 में संशोधन)

प्रस्तावित बदलाव: विधेयक संविधान के अनुच्छेद 82 में संशोधन करके इस अनिवार्य शर्त को हटा देता है कि परिसीमन हर 10 साल की जनगणना के बाद होना चाहिए। विधेयक में जिस शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है, उसके तहत पूर्व के 'हर जनगणना के बाद परिसीमन' की जगह 'निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन' का इस्तेमाल किया गया है। यानी हर जनगणना के बाद की अनिवार्यता को हटाया गया है। 
विवाद क्यों: ऐतिहासिक रूप से, जब भी परिसीमन को रोका या टाला गया था, तो इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत से संविधान संशोधन की जरूरत होती थी, ताकि सत्ताधारी दल इसका दुरुपयोग न कर सके। नए बदलाव के बाद, भविष्य में परिसीमन की टाइमिंग और आंकड़ों का फैसला संसद में दो-तिहाई के विशेष बहुमत की जगह साधारण बहुमत से हो सकेगा। विपक्ष का आरोप है कि यह एक बड़ी सांविधानिक सुरक्षा को खत्म करता है और भविष्य की सरकारों को चुनावी सीमाओं के साथ छेड़छाड़ की छूट देता है।

3. राजनीतिक लाभ और ओबीसी कोटे की मांग

विवाद क्यों: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का आरोप है कि चुनाव से ठीक पहले अचानक हड़बड़ी में लाए गए ये विधेयक केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिए हैं। सोनिया गांधी ने परिसीमन की इस पूरी प्रक्रिया को संविधान पर हमला करार दिया है। इसके अतिरिक्त, विपक्षी दल इस महिला आरक्षण के भीतर पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की महिलाओं के लिए एक अलग सब-कोटा तय करने की भी मांग कर रहे हैं, जिसका नए विधेयकों में कोई जिक्र नहीं है।

विपक्ष महिला आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा है, बल्कि उसका आरोप यह है कि इस आरक्षण के लिए जिस तरह के परिसीमन नियम थोपे जा रहे हैं, वे देश के संघीय ढांचे को बिगाड़ देंगे और राजनीतिक शक्ति का पूरी तरह से उत्तर भारत की तरफ झुकाव कर देंगे।

4. उत्तर-दक्षिण का बढ़ता विवाद

प्रस्तावित बदलाव: सरकार 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करके लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने की कोशिश कर रही है। 
विवाद क्यों: दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश) ने परिवार नियोजन नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करके अपनी जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, जबकि उत्तर भारत में आबादी तेजी से बढ़ी है। अगर 2011 की आबादी के हिसाब से सीटें बढ़ती हैं, तो उत्तर भारत की सीटें बेतहाशा बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत का अनुपातिक प्रतिनिधित्व संसद में घट जाएगा। 
इसे भी एक उदाहरण से समझें। जैसे- अभी तमिलनाडु की आबादी 7.78 करोड़ है और वहां लोकसभा की 39 सीटें हैं। जबकि मध्य प्रदेश की आबादी 8.53 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन यहां 29 सीटें ही हैं। तो जब आबादी के हिसाब से सीटों का बंटवारा होगा, तो मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में सीटें दोगुनी-तिगुनी तक बढ़ जाएगी। जबकि, तमिलनाडु, केरल समेत दक्षिणी राज्यों में सीटें बढ़ेंगी तो, लेकिन ज्यादा नहीं। इसी विवाद की वजह से पहले भी आबादी के हिसाब से सीटें बढ़ाने के प्रावधान पर रोक लगा दी थी।
दक्षिण के नेताओं, जैसे एमके. स्टालिन का मानना है कि यह उन्हें जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए सजा देने जैसा है। हालांकि, सरकार ने दक्षिण का नुकसान न होने का मौखिक आश्वासन दिया है, लेकिन विधेयकों में सीटों के बंटवारे का कोई स्पष्ट फॉर्मूला नहीं बताया गया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे दक्षिण भारत के लिए हानिकारक बताया है। 

परिसीमन कब से रुका है और इसका क्या असर हुआ?

  • किसी राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या कितनी होगी, इसका काम परिसीमन आयोग करता है। 1952 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 82 में आयोग का काम भी तय किया गया है। इसके मुताबिक 10 साल में जब पहली बार जनगणना होगी, तो उसके बाद परिसीमन किया जाएगा।
  • 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान में 42वां संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत 1971 की जनगणना के आधार पर ही 2001 तक विधानसभाओं और लोकसभा की सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया।
  • 2001 में संविधान में 84वां संशोधन किया गया। इसके तहत 2026 के बाद जब पहली जनगणना होगी और उसके आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे, तो ही लोकसभा का परिसीमन किया जाएगा। यानी 2026 के बाद जनगणना होगी 2031 में। उसके बाद ही लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़नी है।  
 
 

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